सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 3, कुल 81 में से
संदर्भ में पढ़ें( २ )
महर्षि सरस्वती नदी के तीर पर बिन्दुसर
थे । उक्त मनु ने अपने स्थान से अपनी महारा
के साथ अपनी उक्त कन्या को रथ में बिठा कर व
के स्थान में ) जाकर ब्राह्म-विवाह-विधि से, जो सब ।
में प्रथम ( उत्तम ) कहा गया है, उस के साथ व्याह दी
फिर समय पाकर कर्दम के वीर्य से देवहूति में ६ कन्याएं
हुईं । पुनः देवहूति के प्रार्थनानुसार बहुत काल के पश्चात्
भगवान् के अंश से कपिल नाम पुत्र हुआ ।
“तस्यां बहुतिथेकाले भगवान्मधुसूदनः ।
कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेऽग्निरिवदारुणि ॥”
( श्री० भा० ३, २४, ६ )
इस उपर्युक्त इतिहास के अनुसार कपिलदेव ब्राह्ममहा-
कल्प के आरम्भ में हुये और उसी समय इस सांख्य शास्त्र
का पुनरुद्भव ( पुनर्जन्म ) हुआ । इसी प्रकार यह शास्त्र
कपिलदेव से आसुरि को, उससे पञ्चशिख को और उस से
शिष्यपरम्परा के द्वारा ईश्वरकृष्ण को प्राप्त हुआ, तथा उन्हों-
ने उस सांख्य को प्रचलित कारिकाओं में, जो “दुःखत्रयाभि-
घातात्,, इस कारिका से आरम्भ होकर “परवादविवर्जि-
ताश्चापि,, इस कारिका पर समाप्त होती हैं, लिखा ।
“एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ ।
आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेनच बहुधाकृतं तन्त्रम् ॥
शिष्यपरम्परागतमीश्वरकृष्णेन चैतदार्याभिः ।
संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग्विज्ञाय सिद्धान्तम् ॥
( सां० का० ७०-७१ )
इसी ईश्वरकृष्णीय सांख्य के आधार पर यह हमारा