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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 81 में से

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पृष्ठ 23

( ८ ) हिंदी सांख्य दर्शन
(क) सत्वगुण प्रीतिरूप या सुखरूप और प्रकाश के अर्थ है
(ख) रजोगुण अप्रीति या दुःखरूप और प्रवृत्तिके अर्थ है।
(ग) तमोगुण विषाद या मोहरूप और नियम ( प्रतिबन्ध )
के लिये होता है ।
(घ) तीनों गुणों में प्रत्येक गुण की अन्य दो गुणों का
अभिभव ( तिरस्कार ) करना, आश्रयण ( दूसरे में रहना )
करना, परिणामके अभिमुख ( संमुख ) करना और सहचार (सं-
ग रहना ) करना वृत्तियें ( क्रियायें ) हैं ॥ १२ ॥
गुणों के प्रकाश आदि प्रयोजनों के हेतु
सत्वं लघुप्रकाशकमिष्टम्, उपष्टम्भकं चलं च रजः ।
गुरु वरणकमेव तमः प्रदीपवच्चार्थतो वृत्तिः॥१३॥
(क) सत्वगुण लघु ( हलका ) होता है, अतएव ( अग्नि
के ऊर्ध्व ज्वलनका वायु के तिर्यक् गमन ( तिरछा चलने ) का
और ) इन्द्रियों में अर्थों ( वस्तुओं ) के प्रकाशन शक्ति का
हेतु होता है ।
(ख) रजोगुण चल होता है, ( अतएव प्रवर्त्तक होता है )
(ग) तमोगुण गुरु ( भारी ) होता है । अतएव आवरण
( नियमन = अवरोध ) करने वाला होता है ।
(घ) “अर्थतः” पुरुषार्थ ( जीवों के अदृष्ट ) वश परस्पर
विरुद्ध स्वभाव वाले भी गुणों की दीपक, तैल, वत्ती और अ-
ग्नि के तुल्य समान कार्य में प्रवृत्ति होती है ॥१३॥
सत्व आदि गुणों में अविवेकित्व आदि की सिद्धि
और उसके लिये प्रधान की सिद्धि
अविवेक्यादेः सिद्धिस्त्रैगुण्यात्तद्विपर्ययाभावात् ।

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