सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाम-वासना में लिप्त व्यक्ति धीरे-धीरे व्यभिचारी
हो जाता है। काम-वासना एक भयानक रोग की भांति उसे
जकड़ लेती है। मोह में पड़ा व्यक्ति अंधा हो जाता है। उसे भला-बुरा
कुछ दिखाई नहीं देता। क्रोधी व्यक्ति क्रोध रूपी अग्नि में स्वयं तो
जलता ही है, दूसरों को भी जलाता है। इस संसार में यदि कहीं सुख
और आनंद है तो ज्ञानी बनने में है।
जन्ममृत्यु हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाऽशुभम्।
नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्॥
मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मरता है। वह
अकेला ही अपने अच्छे-बुरे कर्मों को भोगता है। वह अकेला ही
नर्क में जाता है और परम पद को पाता है।।13।।
जीवन और मृत्यु, कर्मों का भोग, नरक वास और परम
शक्ति का सान्निध्य मनुष्य अकेला ही प्राप्त करता है। कोई
उसके साथ न तो आता है, न जाता है। कोई उसका सहायक
नहीं होता। सब भाई-बंधु यहीं रह जाते हैं। वह अकेला आता
है और अकेला ही जाता है। जीवन का यही चक्र है, जो
शाश्वत है, सनातन है।
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम्।
जिताऽक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत्॥
ब्रह्मज्ञानियों की दृष्टि में स्वर्ग तिनके के समान है, शूरवीर की
दृष्टि में जीवन तिनके के समान है, इन्द्रजीत के लिए स्त्री तिनके
के समान है और जिसे किसी भी वस्तु की कामना नहीं है, उसकी
दृष्टि में यह सारा संसार तिनके के समान है। उसे सारा संसार
क्षणभंगुर दिखाई देता है। वह तत्त्वज्ञानी हो जाता है।।14।।
प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से आचार्य चाणक्य ने शिक्षा दी है
कि मनुष्य को ज्ञान का अर्जन करना चाहिए और यह
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