सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा।
अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्यन्ति चान्यथा॥
वेद पांडित्य व्यर्थ है, शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ है, ऐसा कहने वाले
स्वयं ही व्यर्थ हैं। उनकी ईर्ष्या और दुःख भी व्यर्थ हैं। वे व्यर्थ में
ही दुःखी होते हैं, जबकि वेदों और शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ नहीं
है॥10॥
मूर्खता के वशीभूत होकर ही लोग आप्त ज्ञान को व्यर्थ बताते
हैं, जबकि ज्ञान कोई भी व्यर्थ नहीं होता। ऐसा वे ही लोग कहते
हैं जो वेदों में छिपे ज्ञान के मर्म को समझ नहीं पाते। जिन्हें शास्त्रों
का ,विश्लेषण करना नहीं आता।
दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥
दरिद्रता का नाश दान से, दुर्गति का नाश शालीनता से, मूर्खता
का नाश सद्बुद्धि से और भय का नाश अच्छी भावना से होता
है॥11॥
जो व्यक्ति दरिद्र रहते हुए भी सामर्थ्य के अनुसार दान देकर
दूसरों के कष्टों का निवारण करता है, उसका दान समृद्ध व्यक्ति
के दान से श्रेष्ठ होता है। शालीनता के साथ संकट काल को
सहन करने वाला व्यक्ति अपने संकटों पर विजय प्राप्त करता है
तथा सुशीलता कष्ट को दूर करती है। इसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति
अज्ञान का नाश करता है।
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः।
नाऽस्ति कोपसमो वह्निर्नार्र्ऽस्ति ज्ञानात् परं सुखम्॥
काम-वासना के समान दूसरा रोग नहीं, मोह के समान शत्रु
नहीं, क्रोध के समान आग नहीं और ज्ञान से बढ़कर सुख
नहीं॥12॥
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