सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंमृदुभाषी होना चाहिए। मधुर वचन बोलने में कैसी
दरिद्रता? जो व्यक्ति मीठा बोलता है, उससे सभी प्रसन्न
रहते हैं।।17।।
आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि
मधुर भाषण में सम्मोहन शक्ति होती है। मधुर भाषण सभी पर
प्रभाव डालता है।
संसार कटु विषवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे।
सुभाषितं च सुस्वादु संगति सुजने जने॥
इस संसार रूपी विष-वृक्ष पर दो अमृत के समान मीठे फल
लगते हैं। एक मधुर और दूसरा सत्संगति। मधुर बोलने और अच्छे
लोगों की संगति करने से विष-वृक्ष का प्रभाव नष्ट हो जाता है
और उसका कल्याण हो जाता है।।18।।
आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से संसार को कटु
वृक्ष कहा है। इसे विष वृक्ष भी कहते हैं। इस कटु वृक्ष के दो फल
कड़वे न होकर अत्यंत मीठे हैं, अमृत के समान गुणकारी हैं—मधुर
वचन और सज्जनों की संगति। मनुष्य को चाहिए कि सदा मीठा ही
बोलें।
जन्म-जन्मन्यभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः।
तेनैवाऽभ्यासयोगेन तदेवाभ्यस्यते पुनः॥
अनेक जन्मों से किया गया दान, अध्ययन और तप का
अभ्यास, अगले जन्म में भी उसी अभ्यास के कारण मनुष्य को
सत्कर्मों की ओर बढ़ाता है, अर्थात वह दूसरे जन्म में भी शास्त्रों
के अध्ययन को दान देने की प्रवृत्ति को और तपस्यारत जीवन को
दूसरों के पास तक पहुंचाता है।।19।।
भाव यह है कि हमारे इस जन्म के शुभ कर्म अगले
170