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सर्वकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 424 में से

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पृष्ठ 321

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३०७

अब निष्क्रमण करके उभय दिक् विलग्न होगा। पद्मगर्भ से विनिष्क्रान्त पश्चिम दिशा की ओर पद्मपत्र के समान विस्तृत यष्टि रथ की कर्णिका के समान बनवाये। यह होगा यष्टि के आगे सात संलग्न अश्व के दोनों ओर॥२४-२५॥

तदधस्तावती यष्टेर्मूलादूर्ध्वस्मृतोऽरुणः।
क्षोणी च पीठमित्युक्ता तथान्तः शेषपन्नगाः ॥२६॥
कर्णिका तेजसः पिण्डो भूताद्या बीजसंज्ञिता।
खपरं कर्णिका व्योम वारं पत्रं सकेसरम् ॥२७॥
पत्राग्रं मण्डलं हस्तिरन्तर्व्योमस्थितं पुरे।
वाह्याकाशं च तं विद्धि यष्टिधर्मार्थसंज्ञितम् ॥२८॥

यष्टि के नीचे उसी प्रकार मूल के ऊर्ध्व में अरुण का स्मरण करना चाहिये। पृथ्वी को पीठ कहते हैं। उसमें शेषनागगण की स्थिति है। तेज के पिण्डद्वय को कर्णिका, भूतादि बीजसंज्ञक, खपर, कर्णिका, व्योम तथा वारसमूह को केशरायुक्त पत्र कहते हैं। पत्र के अग्रभाग में मण्डल है। पुर के मध्य में व्योमस्थित हस्ति रहते हैं। उसे बाह्याकाश जानो, जो यष्टिधर्मार्थ नामक है॥२६-२८॥

रथः संवत्सरो ज्ञेयः पितरस्त्वृतवः स्मृताः।
नेत्रं पत्रस्य मूले वै दोषाच्छन्दांसि शङ्करः ॥२९॥
सुषुम्नाद्यास्तु या नाड्यः सहस्रं रविविग्रहे।
अत ऊर्ध्वं विदिक्षु स्यात् पीतं तस्य शतं शतम् ॥३०॥
योजनायतविस्तीर्णमुच्छ्रितं तत्प्रमाणतः।
अरुणो घृणयः प्रोक्ता बाह्यछन्दांसि वाजिनः ॥३१॥
पञ्चर्तुर्वासुकिः प्रोक्तश्चक्रेशोऽस्य भुवस्त्रयः।
एवं सर्वमयं प्रोक्तं रथश्रेष्ठं विभावसोः ॥३२॥

रथ को संवत्सर जानना चाहिये। ऋतुसमूह को पितृगण कहा है। पत्र के मूल में नेत्ररूप रात्रि तथा शम्भुरूपी हैं छन्द। सूर्य शरीर में सुषुम्नादि हजार नाड़ियाँ हैं, इसलिये ऊर्ध्व में विदिकू में १००-१०० पीतवर्ण रहते हैं। वह योजनायत विस्तीर्ण है। उसके प्रमाण से उच्छ्रित अरुण तथा घृणिसमूह (शिखाओं के) के अश्वों को बाह्य छन्द कहा जाता है। वासुकी को पञ्च ऋतु कहा गया है तथा इस भुवन के तीन लोक चक्रेश हैं। इस प्रकार से विभावसु के सर्वमय श्रेष्ठ रथ की बात कही गयी॥२९-३२॥

दर्भैश्च कुसुमैर्वापि लिखेदेतत् समाहितः।
सञ्चिन्त्य मनसा वापि पूर्वोद्दिष्टं विधानतः ॥३३॥
पूजयेत्परमं देवं खखोल्कमिति विश्रुतम्।
नित्यमेष विधिर्ज्ञेयः परो नैमित्तिकः स्मृतः ॥३४॥