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सर्वकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 424 में से

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पृष्ठ 240

२३० श्रीसाम्बपुराणम्

सूर्यदेव कहते हैं—एक बार समस्त लोकों के हितार्थ आदेश पाकर विश्वकर्मा ने इस मूर्त्ति का निर्माण किया है। पूर्वकाल में देवताओं के साथ विश्वकर्मा ने इस मूर्ति का अर्चन किया था। तब हिमालय के पृष्ठदेश में कल्पवृक्ष की स्थापना की थी। वहाँ से स्थान के लिये चन्द्रभागा में प्रविष्ट हुये थे (मूर्त्ति प्रविष्ट हुई थी)। चन्द्रभागा से वैपाश में, वैपाश से शतद्रु में एवं वहाँ से यमुना नदी में प्रविष्ट जानना चाहिये। यमुना से धीरे-धीरे जाह्नवी में आयी। वहाँ से महानदी मोदगंगा में, तदनन्तर मोदगंगा से लवणसमुद्र में मूर्त्ति प्रविष्ट हो गयी। हे मनुष्यश्रेष्ठ! अब मुझे स्थापित करने का कार्य करो।।२९-३३।।

श्रुत्वा देवास्तु तद्वाक्यं निर्मलं प्रीतिवर्द्धनम् ॥३४॥
प्राञ्जलिप्रणता भूताः स्तूयमाना रविस्थिता।
ततो वैवस्वतः प्राज्ञः सर्वधर्मप्रणोदितः ॥३५॥
कारयामास विप्रान्तु विदुर्दैवालयं शुभम्।
स्थापयित्वा रविं भक्त्या त्रिःस्थानेषु सुरोत्तमाः ॥३६॥
निवृत्तिं याति सुकृतो देवकार्यार्थतत्पराः।
सर्वे दीक्षापरा भूत्वा भास्कराद् विधिकाङ्क्षिणः ॥३७॥

देवगण उनकी निर्मल प्रीतिवर्द्धक वाणी सुनकर अञ्जलिबद्ध मुद्रा में प्रणत होकर भगवान् सूर्य की स्तुति करने लगे। तब समस्त धर्मों के प्रेरक वैवस्वत ने ब्राह्मणों द्वारा सूर्य का शुभ देवालय प्रस्तुत कराया। उत्तम देवगणों ने तीन स्थानों पर (सूर्य की तीन मूर्त्ति थी) भक्तिपूर्वक सूर्य को स्थापित करके निवृत्ति प्राप्त की। तदनन्तर देवकार्य में तत्पर उन लोगों ने दीक्षा ग्रहण करके सूर्यदेव से विधि एवं नियम जानने की इच्छा व्यक्त की।।३४-३७।।

यतोऽधिमण्डलं कुर्युस्तद्गतैरन्तरात्मभिः।
लिखितं मण्डलं दिव्यं यथोक्तं भास्करेण तु ॥३८॥
यथाविधि समुद्दिष्टं क्रियां सौरिसमाश्रिताम्।
विश्वकर्माभ्यनुज्ञाय सवर्णां मूर्द्धजाः प्रजाः ॥३९॥
ततो नाम प्रकुर्वन्ति सम्प्रहृष्टतनूरूहाः।
अनेन मुण्डिताः सर्वे तेन मुण्डित उच्यते ॥४०॥

उन्होंने अन्तःकरण के तद्गत भाव से अधिमण्डल की भावना किया (बनाया)। तदनन्तर भास्कर द्वारा कथित दिव्य मण्डल अंकित किया। विश्वकर्मा की अनुमति से सूर्य से सम्बन्धित यथाविधि क्रिया सम्पन्न की। सबके ऊपर प्रजा थी अर्थात् सबसे पहले प्रजा (उपस्थित लोग) का प्रसङ्ग लिया गया। तत्पश्चात् हृष्ट तथा रोमाञ्चित होकर प्रजागण का नामकरण किया गया। सबने मुण्डन कराया था, इसलिये उन्हें 'मुण्डित' कहा गया।।३८-४०।।