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सर्वकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 424 में से

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पृष्ठ 196

१८६ श्रीसाम्बपुराणम्

एवं त्रिषवणस्नातो योऽर्चयेत् प्रयतः सदा।
विधिना तु यथोक्तेन सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥४७॥

इस प्रकार से जो प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकाल (तीन बार) स्नान करके संयत होकर सर्वदा यथोक्त विधानानुसार सूर्यदेव की अर्चना करते हैं, वे अश्वमेध यज्ञ का फललाभ करते हैं॥४७॥

यश्चैवं कुरुते नित्यं यथोक्तं धूपविस्तरम्।
स पुत्रवानरोगी च मृतः संलीयते रवौ॥४८॥
विधिना तु यथोक्तेन क्रियमाणानि यत्नतः।
सर्वकर्माणि सिध्यन्ति सफलानि भवन्ति च॥४९॥

जो नित्य इस प्रकार से विधान के अनुसार धूपदान करते हैं, वे पुत्रवान तथा आरोग्यवान होकर मृत्यु के पश्चात् सूर्य में लीन हो जाते हैं। यथोक्त विधानानुसार सयत्न क्रियमाण सभी कार्य सिद्ध तथा सफल होते हैं॥४८-४९॥

पुष्पश्रेष्ठं च दानं स्यात् पत्रं समुपहारयेत्।
पत्रं न स्यात्ततो धूपं धूपो न स्यात्ततो जलम्॥५०॥
सर्वं न स्यात्तदा चैव प्रणिपातेन पूजयेत्।
अशक्तः प्रणिपातेऽपि मनसा पूजयेत्ततः॥५१॥

पुष्प ही श्रेष्ठ दान है। उसके अभाव में पत्र प्रदान करे। (पत्र) पत्ता न मिलने पर धूप प्रदान करे। धूप भी न मिले, तब जल प्रदान करे। यदि जल भी न मिले, तब प्रणाम करके पूजन करे। यदि प्रणाम करने में भी असमर्थता हो, तब मन ही मन पूजा करनी चाहिये॥५०-५१॥

असम्भवे तु द्रव्याणां विधिरेष प्रकीर्तितः।
द्रव्याणां सम्भवे चैव सर्वमेवोपहारयेत्॥५२॥
मन्त्राद्याः कथिता ये तु पुष्पधूपनिवेदने।
व्याहारात् स्मरणाच्चैव तेषां प्रीतो भवेद्रविः॥५३॥

इति श्रीसाम्बपुराणे अग्निधूपविधिर्नाम षट्त्रिंशत्तितमोऽध्यायः

यदि कोई द्रव्यहीन हो, तब यह विधि है। यदि द्रव्यों का संग्रह सम्भव हो, तब सबका संग्रह करना चाहिये। पुष्प तथा धूप-निवेदनार्थ जिन मन्त्रों को कहा गया है, उनके कहने से तथा स्मरण करने से भी सूर्य के प्रति प्रीति उत्पन्न होती है॥५२-५३॥

श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत अग्निधूपदानविधि नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त