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सर्वकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 310 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

वास्तोष्पते ध्रुवा स्थूणा ꣲ सत्र ꣲ सोम्यानाम्.
द्रप्सः पुरां भेत्ता शश्वतीनामिन्द्रो मुनीना ꣲ सखा.. (३)
हे इंद्र! आप घर के स्वामी हैं. हमारे घर के खंभे व सोम यज्ञ करने वालों का शरीर
मजबूत हो. सोम पीने वाले राक्षसों की बहुत सी नगरियां उजाड़ने वाले इंद्र हम ऋषियों के
मित्र हों. (३)
वण्महाँ असि सूर्य बडादित्य महाँ असि.
महस्ते सतो महिमा पनिष्टम महा देव महाँ असि.. (४)
हे इंद्र! आप प्रेरणा देने वाले, बहुत तेजस्वी, अदिति के पुत्र व बहुत बलशाली हैं. हम
सच कहते हैं कि आप बहुत महान हैं. (४)
अश्वी रथी सुरूप इदगोमान् यदिन्द्र ते सखा.
श्वात्रभाजा वयसा सचते सदा चन्द्रैर्याति सभामुप.. (५)
हे इंद्र! जो आप को अपना मित्र बना लेता है, वह बहुत सुंदर रूप वाला हो जाता है.
वह बहुत घोड़ों वाला हो जाता है. वह बहुत रथों वाला हो जाता है. वह बहुत गायों वाला हो
जाता है. वह बहुत अन्न, धन वाला हो जाता है. वह सदा अच्छे वस्त्रों और आभूषणों से तैयार
हो कर सभा में जाता है. (५)
यद्द्याव इन्द्र ते शत ꣲ शतं भूमीरुत स्युः.
न त्वा वज्रिन्तसहस्र ꣲ सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी.. (६)
हे इंद्र! स्वर्गलोक सौ गुना हो जाए तो भी आप की बराबरी नहीं कर सकता. भूमिलोक
(पृथ्वीलोक) सौ गुना हो जाए तो भी आप के समान नहीं हो सकता. हे वज्रधारी इंद्र! सौ सूर्य
भी आप को प्रकाशित नहीं कर सकते. बाद में होने वाले भी आप की बराबरी नहीं कर
सकते यानी आप के सामने कोई कुछ नहीं है. आप ही सब से बड़े हैं. (६)
यदिन्द्र प्रागपागुदङ्न्यग्वा हूयसे नृभिः.
सिमा पूरू नृषूतो अस्यानवे ऽ सि प्रशर्ध तुर्वशे.. (७)
हे इंद्र! पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण सभी दिशाओं से मनुष्य आप को सहायता के
लिए बुलाते हैं. आप शत्रुओं का नाश करने वाले हैं. अनु और तुर्वश के लिए स्तुतियों से
आप को बुलाया जाता है. (७)
कस्तमिन्द्र त्वा वसवा मर्त्यो दधर्षति.
श्रद्धा हि ते मघवन्पार्ये दिवि वाजी वाज ꣲ सिषासति.. (८)
हे इंद्र! आप सब को बसाने वाले हैं. आप को कौन डरा सकता है. आप के प्रति जो
यजमान श्रद्धालु होता है, वह दुःख से पार होने पर भी हवि देने की इच्छा रखता है. (८)
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