सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 310 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे वायु! आप के पास गुप्त रूप से अमृत है. आप हमें जीने के लिए छिपा कर रखा
हुआ वह गुप्त अमृत प्रदान करने की कृपा कीजिए. (९)
अभि वाजी विश्वरूपो जनित्र २४ हिरण्ययं बिभ्रदत्क २४ सुपर्ण:.
सूर्यस्य भानुमृतुथा वसान: परि स्वयं मेधमृज्रो जजान.. (१०)
हे अग्नि! आप विश्वरूप व सुपर्ण (गरुड़) जैसे वेगवान हैं. आप उत्पत्ति स्थान
(यज्ञवेदी) को सोने सा चमका देते हैं. आप ऋतु के अनुकूल सूर्य व मेघ को धारण करते हैं.
(१०)
अप्सु रेत: शिश्रिये विश्वरूपं तेज: पृथिव्यामधि यत्संबभूव.
अन्तरिक्षे स्वं महिमानं मिमान: कनिक्रन्ति वृष्णो अश्वस्य रेत:.. (११)
हे अग्नि! आप का वीर्य घोड़े के वीर्य की तरह है, विश्वरूप है, तेजोमय है, जल में
(बादल रूप में) आश्रय पाता है, पृथ्वी पर जीवन शक्ति के रूप में है. अंतरिक्ष में अपनी
व्यापक महिमा को फैलाए हुए है. वह सर्वत्र अपनी व्यापकता लिए हुए है. (११)
अय २४ सहस्रा परि युक्ता वसान: सूर्यस्य भानुं यज्ञो दाधार.
सहस्रदा: शतदा भूरिदावा धर्ता दिवो भुवनस्य विशपति:.. (१२)
हे यजमानो! अग्नि हजारों किरणों वाले सूर्य के तेज को धारण करते हैं. वे यज्ञ का मूल
आधार है. वे स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक को धारण करते हैं. वे सैकड़ोंहजारों प्रकार के
ऐश्वर्यदाता व विश्वपति हैं. (१२)
नाके सुपर्णमुप यत्पतन्त २४ हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा.
हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम्.. (१३)
हे वेन! उपासक आप को हृदय से पाने की इच्छा करते हैं. इस इच्छा से वे ऊपर देखते
हैं. तब वे आप को अंतरिक्षलोक में अग्नि (विद्युत् रूपधारी) के पास पाते हैं. आप वरुण के
दूत हैं, सोने के पंखों वाले हैं, यम की योनि में हैं व विश्व का भरणपोषण करने वाले हैं. (१३)
ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्रत्यङ्कचित्रा बिभ्रदस्यायुधानि.
वसानो अत्क २४ सुरभिं दृशे क २४ स्वा ३ र्ण नाम जनत प्रियाणि.. (१४)
हे वेन! आप ऊंचे स्वर्गलोक के पास रहते हैं. आप अद्भुत आयुध धारण कर के
सुशोभित होते हैं. आप सूर्य की तरह प्राणियों के लिए जल धारण कर के उसे बरसाते हैं.
(१४)
द्रप्स: समुद्रमभि यज्जिगाति पश्यन् गृध्रस्य चक्षसा विधर्मन्.
भानु: शुक्रेण शोचिषा चकानस्तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि.. (१५)
हे वेन! जब आप समुद्र के जल को ले कर गिद्ध जैसी दृष्टि से देखते हुए मेघों के पास
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