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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

गया हूँ, मेरा चित्त स्थिर हो गया है—‘इदानीमस्मि संवृतः सचेताः’, विराट् रूपको देखकर जो मैं भयभीत हो गया था, वह सब भय अब मिट गया है, सब व्यथा चली गयी है और मैं अपनी वास्तविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ—‘प्रकृतिं गतः’। यहाँ ‘सचेताः’ कहनेका तात्पर्य है कि जब अर्जुनकी

दृष्टि भगवान्की कृपाकी तरफ गयी, तब अर्जुनको होश आया और वे सोचने लगे कि कहाँ तो मैं और कहाँ भगवान्का विस्मयकारक विलक्षण विराट् रूप! इसमें मेरी कोई योग्यता, अधिकारिता नहीं है। इसमें तो केवल भगवान्की कृपा—ही-कृपा है।

परिशिष्ट भाव —भगवान्का सौम्यरूप द्विभुज होनेके कारण अर्जुने उसको मनुष्यरूप कहा है। भगवान् श्रीकृष्ण द्विभुज थे। ब्रह्मवैवर्तपुराणमें आया है—

त्वमेव भगवानाद्यो निर्गुणः प्रकृतेः परः। अद्वागिो द्विभुजः कृष्णोऽप्यद्वागिनि चतुर्भुजः ॥

(प्रकृति० १२।१५)

‘आप सबके आदि, निर्गुण और प्रकृतिसे अतीत भगवान् ही अपने आधे अंगसे द्विभुज कृष्ण और आधे अंगसे चतुर्भुज विष्णुके रूपमें प्रकट हुए हैं।’

द्विभुजो राधिकाकान्तो लक्ष्मीकान्तश्चतुर्भुजः। गोलोके द्विभुजस्तथौ गोपैर्गोपीभिरावृतः ॥

चतुर्भुजश्च वैकुण्ठं प्रययौ पद्मया सह। सर्वांशिन समी तौ द्वौ कृष्णनारायणौ परौ ॥

(प्रकृति० ३५।१४-१५)

‘द्विभुज कृष्ण राधिकापति हैं और चतुर्भुज विष्णु लक्ष्मीपति हैं। कृष्ण गोप-गोपियोंसे आवृत होकर गोलोकमें और विष्णु लक्ष्मीके साथ (पार्षदोंसहित) वैकुण्ठमें स्थित हैं। वे कृष्ण और विष्णु—दोनों सब प्रकारसे समान अर्थात् एक ही हैं।’

तात्पर्य है कि द्विभुजरूप (कृष्ण), चतुर्भुजरूप (विष्णु) और सहस्रभुजरूप (विराट् रूप)—तीनों एक ही समग्र भगवान्के रूप हैं।

सम्बन्ध—अर्जुनकी कृतज्ञताका अनुमोदन करते हुए भगवान् कहते हैं—

श्रीभगवानुवाच

सुदुर्दशंमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।

देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥

श्रीभगवान् बोले—

मम= मेरासुदुर्दशंम्= इसके दर्शनरूपस्य= रूपको
इदम्= यहअत्यन्त हीनित्यम्,
यत्= जोदुर्लभ हैं।दर्शनकाङ्क्षिणः= देखनेके
रूपम्= (चतुर्भुज) रूपदेवाः= देवतालिये नित्य
दृष्टवान्,अपि= भीलालायित
असि= (तुमने) देखा है,अस्य= इसरहते हैं।

व्याख्या —‘सुदुर्दशंमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम’—

यहाँ ‘सुदुर्दशंम्’ पद चतुर्भुजरूपके लिये ही आया है, विराट् रूप या द्विभुजरूपके लिये नहीं। कारण कि विराट् रूपकी तो देवता भी कल्पना क्यों करने लगे! और मनुष्यरूप जब मनुष्योंके लिये सुलभ था, तब देवताओंके लिये वह दुर्लभ कैसे होता! इसलिये ‘सुदुर्दशंम्’ पदसे भगवान् विष्णुका चतुर्भुजरूप ही लेना चाहिये, जिसके लिये ‘देवरूपम्’ (११।४५) और ‘स्वर्क रूपम्’ (११।

५०) पद आये हैं।

‘देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः’—

भगवान्ने यहाँ कहा है कि मेरा यह जो चतुर्भुजरूप है इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। आगे तिरपनवें-चौवनवें श्लोकोंमें कहा है कि इस चतुर्भुजरूपके दर्शन वेद, यज्ञ, तप, दान आदि साधनोंसे नहीं हो सकते; प्रत्युत इसके दर्शन तो अनन्यभक्तिसे ही हो सकते हैं। अब यहाँ एक शंका होती है कि देवता भी इस रूपके दर्शनकी नित्य आकांक्षा