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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

१७४ : सचित्र ज्योतिष शिखा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

यदि उस बांस का झुकाव ध्रुव की ओर हो तो वह बांस ध्रुव की सीध में हो जायगा और आस पास जहाँ बांस की छाया पड़ती है, समय सूचक चिन्ह बना देने से पशु घड़ी का काम देगा। इसी सिद्धान्त पर घूघ घड़ी बनी है।

घूघ घड़ी बनाने के लिए गोल पुट्टे का टुकड़ा लो उसमें समान २४ भाग बना कर घंटे का निशान लगा दो जिससे २४ निशान २४ घंटा बन जायेंगे। फिर एक सलाई उस पुट्टे के ठीक बीचों बीच इस प्रकार छेद कर लगा दो कि वह पुट्टे के समकोण में रहे। फिर उस सलाई की एक नोक ध्रुव की ओर करके उसे जमीन में इस प्रकार गाड़ दो या जमा दो कि सलाई भूमि में उस स्थान के अक्षांश के बराबर कोण बनाये। उस सलाई की छाया समय सूचक अंकों पर पड़ने से वहाँ का ठीक समय ज्ञात होगा। जैसे चित्रसंख्या ८३ में बताया है, समय सूचक अंकों पर सलाई की जहाँ छाया पड़ेगी उसी के अनुसार स्थानिक समय होगा।

चित्रसंख्या ८३ देखो यहाँ गोल पुट्टे में बाहर की ओर समय सूचक घंटों के चिन्ह बने हैं। आगे आवश्यक न होने से और भी घंटों के अंक नहीं लिखे गये हैं। मध्यान्द्र के १२ बजे का चिन्ह सबसे नीचे रहता है। यह घूघघड़ी २८° के अक्षांश के स्थान पर समय बतायेगी।

भीतर की ओर १५-१५ अंश के अन्तर पर अंश के चिन्ह लगाकर अंश लिखे हैं। एक घंटे के भीतर १५-१५ मिनट के ४ कोटि बने हैं। यहाँ स्थानाभाव के कारण और विभाग नहीं किये गये। इन प्रत्येक कोटों के ३-३ और विभाग करने से प्रत्येक विभाग ५-५ मिनट का बन जायेगा।

अब घूघघड़ी को कहीं स्थापित करने के लिए स्थाई बनाना है तो इस प्रकार बनायेंगे-

चित्र संख्या ८३ घूघघड़ी

एक त्रिकोण इस प्रकार बनाओ जिसका एक कोण अपने स्थान के अक्षांश के बराबर हो और उसे किसी सम चबूतरे पर इस प्रकार पक्की तौर पर जमा दो कि

धूप घड़ी : १७५

उस त्रिकोण का ऊपरी किनारा ध्रुव की सीध में रहे। फिर इस गोल समय सूचक चक्र को (जो किसी घातु के पत्र पर बनाया गया हो) नीचे की ओर जहाँ १२ वजे का चिन्ह है इस प्रकार समकोण बनाते हुए केन्द्र विन्दु तक काटो, जिससे वह पहिले बताये हुए त्रिकोण में फँसाया जा सके। फिर उसे उस त्रिकोण में इस प्रकार फँसा दो कि त्रिकोण पर वह समकोण बनावे। अब इस त्रिकोण की ऊपरी छाया गोल चक्र पर पड़ेगी, वह समय सूचक होगी। इस गोल चक्र का ऊपरी अनावश्यक भाग काटकर फेंक दो। बड़े से बड़ा जितने घंटे का दिनमान उस स्थान पर होता

चित्रसंख्या ८४ धूपघड़ी बनाने का चक्र बनाना

है उतने ही घंटों के चिन्ह की आवश्यकता पड़ेगी। शेष भाग अनावश्यक होंगे, इस कारण अनावश्यक भाग को निकाल देना चाहिए, जैसा चित्रसंख्या ८४ में बताया है।

यहाँ २८° के अक्षांश पर धूपघड़ी बनी है, इस कारण १४ घंटे के चिन्ह यहाँ रहने दिये हैं। पहिले बता चुके हैं कि २४°-१२° से ३०°-३८° अक्षांश तक १४ घंटे का परम दिन होता है। इस कारण केवल १४ घंटे के चिन्ह यहाँ बनाये हैं। इस प्रकार के कटे हुए चक्र को त्रिकोण समकोण बनाते हुए जमाया है जैसा चित्र

चित्रसंख्या ८५ चक्र को त्रिकोण में फँसाना

१७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

संख्या ८५ में बनाया है। चक्र में जो १२ वज्रे के स्थान में केन्द्र तक फँसाने के लिए पहिले काट लिया गया था, उसी कटे हुए स्थान को त्रिकोण में फँसा कर जमाना चाहिए जिससे त्रिकोण के दोनों ओर उस चक्र का भाग निकला रहे। इसी चक्र में जिस स्थान पर त्रिकोण की छाया पड़ेगी, वहाँ बनाये हुए चिन्ह के अनुसार समय घंटा मिनट में जाना जा सकेगा।

चक्र को त्रिकोण में फँसाने के लिए यदि आधा त्रिकोण का भाग और आधा चक्र का भाग काट कर फँसाया जाय तो अच्छा अम जाता है और इसे त्रिकोण में जमाते समय इस बात का ध्यान रहे कि त्रिकोण और चक्र के बीच दोनों ओर समकोण रहे।

फिर इस त्रिकोण को किसी लकड़ी के छोटे पटिया पर जमा दो। वस यही धूप घड़ी बन गई। समय देखने के लिए इसे सदैव इस प्रकार रखना चाहिए कि त्रिकोण का ऊपरी किनारा और नोक ध्रुव की सीध में रहे।

●

अध्याय ३५

१ बिना पंचाङ्ग के तिथिज्ञान

यदि पंचाङ्ग पास न हो तो स्थूल रूप से तिथि वार नक्षत्र आदि का ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है यह नवीन विचार्यों को जानना आवश्यक है। इस कारण इन सबके जानने की रीति यहाँ बतलाते हैं।

इन विधियों से स्थूल ज्ञान ही होता है। सूक्ष्म ज्ञान तो गणित द्वारा ही होता है, इसका सूक्ष्म ज्ञान गणित-खण्ड में मिलेगा। यहाँ तो प्रारम्भिक ज्ञान की बातें बताई जायेगी।

पहिले बता चुके हैं कि किस-किस मास की पूर्णमासी को कौन-कौन नक्षत्र पड़ते हैं, उनको स्मरण रखना चाहिये।

१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२
मास चैत्र वैशाख ज्येष्ठ आषाढ़ श्रावण भा. प. आश्विन कार्तिक मार्ग शेष माघ फाल्गुन
नक्षत्र चित्रा वि. ज्येष्ठा पू. रा. श्रवण. पू. भा. अश्वि० कृत्ति० मृग० पुष्य. मघा. उ.फा.

जिस दिन की तिथि जानना है उस दिन का नक्षत्र मालूम करो। फिर पूर्णमासी के आगे जो नक्षत्र हो उससे इष्ट दिन के नक्षत्र तक गिनो। जो संख्या हो, कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से उतना गिन कर तिथि कह दो। कभी-कभी तिथि में क्षय वृद्धि होने

विना पंचांग के तिथिज्ञान : १७७

से एक तिथि का अन्तर पड़ जाता है। १५ दिन से अधिक हो तो अमावस्या की १५ तिथि घटा कर शेष तिथि शुक्ल पक्ष की जानना।

पूर्णमासी को जो नक्षत्र बताये हैं उनमें भी कभी-कभी एक नक्षत्र का अन्तर पड़ जाता है, क्योंकि कोई नक्षत्र दिन के पहिले भाग में ही अन्त हो जाता है, कोई पूरे दिन भर रहता है, इस कारण तिथि में भी कभी-कभी अन्तर पड़ जाता है और कभी-कभी तिथि ठीक निकलती है।

(१) जैसे सम्वत् २००० में धनिष्ठा नक्षत्र को कौन तिथि वैशाख में होगी जानना है। चैत्र पूर्णिमा को नक्षत्र बिन्दा था, उसके आगे का नक्षत्र स्वाती से धनिष्ठा तक गिना तो ९ हुए। कृष्ण प्रतिपदा से गिना तो ९. तिथि हुई। पंचाङ्ग देखो तो उस दिन दशमी तिथि है। सप्तमी की हानि होने से तिथि का अन्तर पड़ गया।

(२) आवण में मूल नक्षत्र को कौन तिथि पड़ेगी यह जानना है। आपाङ्क की पूर्णिमा को पू. पा. नक्षत्र के आगे का नक्षत्र उ. पा. से मूल तक गिना तो—२५ आये, ये १५ से अधिक होने से, १५ तिथि अमावस्या तक के घटाये तो, शेष १० रहे। ये शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि हुई। पंचाङ्ग में उस दिन म्यारस थी। इस उदाहरण में आवण की पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र होता है, अपना मूल नक्षत्र उसके पहिले आता है, इससे इसके पहिले का मास आपाङ्क की पूर्णमासी ली गई।

सूर्य और चन्द्र से तिथि जानना और तारीख से तिथि जानना आगे बताया गया है।

२-विना पंचाङ्ग के वार (दिन) जानना

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को जो दिन हो वह उस वर्ष का राजा कहलाता है। चैत्र शुक्ल परिव्रा से गत मास की अमावस्या तक गिनो, जो संख्या हो उसे १३ से गुणा करो और उसमें वर्तमान महिना के पक्ष के बीते हुए दिन जोड़ दो और योग में ७ का भाग दो, शेष बचे उसे वार के राजा से उस संख्या तक गिनो तो वार ज्ञात होगा।

(१) जैसे सम्वत् २००० में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सोमवार था। यही सोम-वार वर्ष का राजा कहलाया।

सम्वत् २००० में आपाङ्क शुक्ल ११ का वार जानना है।

चैत्र शुक्ल १ से आपाङ्क की अमावस्या तक गत मास=३ हुए ५ \times १३ = ६५ आपाङ्क की अमावस्या से आपाङ्क शुक्ल ११ तक गत दिन=१० पहिले के ४३ + १० = ५३ ५३ \div ७ = ७ शेष ३। वर्ष का राजा सोमवार से ३ गिना, तो सोमवार गत हुआ, वर्तमान मंगल वार आया। पहिले गत दिन लिया था, इस कारण सोमवार गत दिन आया। यदि वर्तमान दिन लिया होता तो उत्तर में वर्तमान दिन आता। पंचाङ्ग में आपाङ्क शुक्ल ११ को मंगलवार है।

(२) सम्वत् २००० कुआरि वदी १४ को कौन वार था ?

१२

१७८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चैत्र से भादों की अमावस तक=१ मास X १३=१३ भादों की अमावस से भादों की पूर्णिमा तक १५ दिन, आगे कातिक बदी १४ तक=१४ दिन। ७३+१४+१४ दिन=३६३ दिन=७-शेष १३ दिन। वर्ष के राजा सोमवार से १३ गिना तो दूसरा मंगलवार आया। इस कारण उस दिन मंगलवार था।

(३) सम्बत् २००१ राजा शनि। माघ कृष्ण १० का दिन जानना है।

चैत्र शुक्ल १ से पूस की अमावस तक=१ मास X १३=१३ पूस की अमावस से पूस की पूर्नो तक=१५ दिन। पूस की पूर्णिमा से माघ कृष्ण १० तक=१० दिन। १३+१५+१०=३८=शेष ३३ दिन। वर्ष का राजा शनि से गिना चौथा दिन मंगल बार का दोपहर आया। आधा दिन बचा था इतने मण्ट हुआ उस दिन बसो आये दिन तक थी।

(४) सम्बत् २००१ राजा शनि। आषाढ़ शुक्ल १३ का दिन जानना है।

चैत्र शुक्ल १ से आषाढ़ कृष्ण ३० तक=३ मास X १३=४३ आषाढ़ ३० से आषाढ़ शुक्ल १३ तक=१३ दिन। ४३+१३=१७३=७ शेष ३॥ दिन ३ राजा शनि से चौथा बार मंगलवार हुआ। आधा दिन आया है अर्थात् १३ तिथि उस दिन आये दिन तक ही थी।

बहूधा दिन के किसी भी समय पर तिथि का अन्त हो जाता है। तिथि की हानि या वृद्धि भी हो जाती है, जिसके कारण बार में भी कभी-कभी एक दिन का अन्तर पड़ जाता है।

आगे वर्ष के राजा का चक्र कई वर्षों का दिया है जिससे कहीं खोजना न पड़े।

कई वर्षों के वर्ष के राजा का चक्र

सम्बत्राजाबारसम्बत्राजासम्बत्राजासम्बत्राजासम्बत्राजा
१८४८सोम.१८६९शनि.१८८४बुध.१८९७शुक्र.१९१०शनि.
१८४९शुक्र.१८७०शुक्र.१८८५रवि.१८९८बुध.१९११बुध.
१८५०शुक्र.१८७१मंगल१८८६शनि.१८९९सोम.१९१२सोम
१८५१मंगल१८७२सोम.१८८७गुरु.१९००शुक्र.१९१३रवि.
१८५३शुक्र.१८७३शुक्र.१८८८मंगल१९०१मंगल१९१४गुरु.
१८५४बुध.१८७४मंगल१८८९सोम.१९०२शनि.१९१५मंगल
१८५७बुध.१८७६शुक्र.१८९०शुक्र.१९०३शनि.१९१६सोम.
१८५८रवि.१८७७बुध.१८९१गुरु.१९०४बुध.१९१७शुक्र.
१८५९शनि१८७८मंगल१८९२सोम.१९०५मंगल१९१८गुरु.
१८६०गुरु.१८८०शनि.१८९३शुक्र१९०६रवि.१९१९सोम.
१८६१बुध.१८८१बुध.१८९४गुरु.१९०७गुरु.१९२०शुक्र.
१८६२सोम.१९०२रवि.१८९५सोम.१९०८बुध.१९२१गुरु.
१८६७गुरु.१८८३शनि.१८९६शनि.१९०९रवि.१९२२मंगल

बिना पंचांग के तिथिज्ञान : १७९

सम्वत्‌ राजा सम्वत्‌ राजा सम्वत्‌ राजा सम्वत्‌ राजा सम्वत्‌ राजा

१९२३ शनि. १९४३ सोम. १९६३ रवि. १९८३ रवि. २००३ वुध.

१९२४ शुक्र. १९४४ शुक्र. १९६४ शुक्र, १९८४ रवि. २००४ रवि.

१९२५ वृध, १९४५ गुरुः १९६५ गुर. १९८५ गुरु. २००५ शनि.

१९२६ रवि १९४६ सोम. १९६६ सोम. १९८६ बुध, २००६ बुध,

१९२७ शनि, १९४७ शुक्र. १९६७ रवि. १९८७ सोम. २००७ रवि.

१९२८ बुध. १९४८ गुरु. १९६८ शुक्र. १९८८ शुक्र. २००८ शनि,

१९२९ सोम. १९४९ मंगल १९६९ मंगल. १९८९ वुध, २००९ बुध.

१९३० शनि. १९५० रवि. १९७० सोम. १९९० सोम. २०१० सोम.

१९३१ गुरु, १९५१ शनिः १९७१ शुक्र. १९९१ शुक्र २०११ रवि.

१९३२ बुध, १९५२ वुध. १९७२ मंगल १९९२ गुरु.

१९३३ रवि. १९५३ रवि. १९७३ सोम. १९९३ मङ्गल

१९३४ शुक्र, १९५४ शनि. १९७४ शुक्र. १९९४ सोम.

१९३५ बुध. १९५५ बुध. १९७५ शुक्र, १९९५ शुक्र

१९३६ रवि. १९५६ मंगल १९७६ मंगल १९९६ बुध,

१९३७ शनि. १९५७ शनि. १९७७ रवि. १९९७ सोम.

११३८ वुध. १९५८ गुरु, १९७८ शनिः १९९८ शुक्र.

१९३९ सोम. १९५९ बुध १९७९ बुध. १९९९ मंगल. `

१९४० रवि. १९६० रवि १९८० रवि. २००० सोम.

१९४१ शुक्र १९६१ शुक्र, १९८१ शनि. २००१ शनि.

१९४२ मंगल १९६२ बुधः १९८२ बुध. २००२ गुरु.

३-बिना पंचांग के नक्षत्र जानना

किसी चान्द्र मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र होता है पहिले बता चुके हैं । पूणिमा

से आगे की तिथि तक गिनो, उस संख्या को गत पूर्णिमा की नक्षत्र संख्या में जोड़ दो

अर्थात्‌ पूणिमा को जो नक्षत्र हो उसके आगे इष्ट तिथि की संख्या तक गिनो तो इष्ट

नक्षत्र निकल आयगा ।

( १ ) जैसे सम्बत्‌ २००० में कातिक शुक्ल चतुर्थी को नक्षत्र जानना है.। इसके

पहिले कुँआर पूर्णिमा को अश्विनी नक्षत्र होता है । कुंआर पूणिमा से कातिक अमावस्या

तक १५ दिन और कातिक शुक्ल चौथ तक गत दिन १५+ ३=१८ दिन हुए । अब

पूर्णिमा का नक्षत्र अश्विनी से गिना तो १५ वां नक्षत्र ज्येष्ठा आया । पंचांग में भी

उस दिन ज्येष्ठा दिया है ।

(२) दूसरी रीतिन्कातिक कुष्ण १ से इष्ट मास तक गिन कर दूना करो ओर

बीते पक्ष के दिन जोड़ कर १ ओर मिला दो और २७ का भाग दो । शेष जो बचे

१६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

उसे अश्विनी से गिन कर इष्ट नक्षत्र कहना। पक्ष के दिन जोड़ने के लिए कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को गिनो और आगे गिनना आरम्भ कर इष्ट तिथि तक गिनना चाहिए।

जैसे ऊपर के उदाहरण में गत मास कुंभार है। इसे कार्तिक से गिना तो यह कुंभार १२ वां महिना हुआ। १२ x २ = २४ + गततिथि (कुंभार पूर्णिमा से कार्तिक अमावस्या तक १५ + चौथे के ४ दिन) + १ = २४ + १५ + ४ + १ = ४४ ÷ २७ = शेष १७ = १७ वां नक्षत्र अनुराधा होता है। इस कारण इष्ट तिथि को अनुराधा नक्षत्र आया। पंचांग में उस दिन ज्येष्ठा नक्षत्र है। इसमें भी कभी २ एक नक्षत्र का अन्तर पड़ जाता है।

दूसरा उदाहरण—माघकृष्ण १० को सम्बत् २००० में नक्षत्र जानना है। गत मास पूस हुआ। कार्तिक से पूस तक = ३ मास x २ = ६ + गत दिन माघ कृष्ण के १५ + माघ शुक्ल के १० दिन + १ = ६ + १५ + १० + १ = ३२ ÷ २७ = शेष ५ = मृगशिर। पंचांग में कुछ देर उपरान्त रोहिणी था, १ का अन्तर पड़ गया। तिथि के घट बढ़ जाने से प्रायः १ दिन का कभी २ अन्तर पड़ जाता है।

(३) तीसरी रीति अमावस्या को सूर्य और चन्द्र एक साथ रहते हैं। यदि सूर्य नक्षत्र ज्ञात हो तो अमावस्या से आगे जितने दिन (इष्ट दिन तक) हों गिनो, उतने दिन सूर्य नक्षत्र से गिनने पर अपना दिन नक्षत्र (चंद्र नक्षत्र) आयगा।

आकाश में भी यदि चंद्र दिखता है तो चंद्र के समीप जो नक्षत्र होगा आकाश में देखकर भता दो। उस दिन वही नक्षत्र होगा।

(४) बिना पंचाङ्ग के योग जानना

सूर्य का जो नक्षत्र हो मालूम करो। सूर्य नक्षत्र से पुष्य नक्षत्र तक दोनों नक्षत्रों को मिलाते हुए गिनो, फिर जिस दिन का योग जानना है उस दिन के चन्द्र नक्षत्र तक अवन से गिनो। दोनों संख्या जोड़ कर २७ का भाग दो, जो शेष बचे वह संख्या योग की होगी।

जैसे सं० २००० में श्रावण शुक्ल १० को जानना है। उस दिन सूर्य आश्लेषा नक्षत्र पर है और इष्ट दिन (दशमी) को ज्येष्ठा नक्षत्र है। अब पुष्य नक्षत्र से सूर्य के आश्लेषा नक्षत्र तक गिना = यह दूसरा नक्षत्र है = २ संख्या हुई। फिर श्रावण से इष्ट नक्षत्र ज्येष्ठा तक गिना २३ आये। = २३ + २ = २५ ÷ २७ = शेष २५ रहे, २५ वां योग ब्रह्म योग आया, पंचांग में २६ वां योग ऐन्द्र है। नक्षत्रों के घट बढ़ जाने से इसमें भी कभी-कभी एक दिन का अन्तर पड़ जाता है।

(५) बिना पंचाङ्ग के करण जानना

शुक्ल प्रतिपदा से इष्ट तिथि को गिन कर दूना करो और १ घटा कर ७ का भाग दो तो ये चर करण निकलेंगे। वह करण तिथि के उत्तरार्द्ध में मिलेगा। पूर्वार्द्ध में उसके पहिले का करण जानना।

विना पंचांग के तिथिक्रम : १-१

ये ७ चर करण है : (१) वव (२) वालव, (३) कोलव, (४) तैतिल (५) गर, (६) वणिज, (७) विष्टि ।

स्थिर करण ४ है :—(१) शकुनि, (२) चतुष्पद, (३) नाग (४) किस्तुज ।

स्थिर करण—शुक्ल परिव्रा को पूर्वार्द्ध में किस्तुज; उत्तरार्द्ध में वव (चर) अमावस्या, कृष्ण ३० को पूर्वार्द्ध में चतुष्पद उत्तरार्द्ध में नाग, कृष्ण १४ को पूर्वार्द्ध में विष्टि (चर) उत्तरार्द्ध में शकुनि ।

उदाहरण—सम्बत् २००० में श्रावण पूर्णिमा को करण जानना है । पूर्णिमा तक १५ तिथि=१५ X २=३०-१=२९÷७=शेष १=वव करण उत्तरार्द्ध में, इसके पूर्वार्द्ध में (इसके पहिले का) विष्टि करण होगा । १ तिथि में २ करण होते हैं ।

पहिले करण जानना का चक्र दे चुके हैं, उसके द्वारा किसी भी तिथि का करण सरलता से जान सकते हैं ।

(६) विना पंचाङ्ग को चन्द्र जानना

(इष्ट तिथि X २) X (कृष्ण पक्ष में ३५, शुक्ल पक्ष में ५) ÷ = लब्धि वर्तमान संक्रांति जिस राशि की हो उस राशि से लब्धि संख्या तक गिनो तो चन्द्र की राशि निकलैगी । गिनने में १२ से अधिक संख्या हो तो १२ घटा कर शेष अंक लेना ।

(१) जैसे सं० २००० वैशाख शुक्ल १२ को चन्द्र जानना है ।

तिथि १२ X २=२४+५ शुक्ल पक्ष के=२९÷५=लब्धि ५ ५) २९(५ लब्धि दशमी को वृष संक्रांति थी । वृष से लेकर लब्धि का अंक ५ तक २५ गिना तो कन्या आई । तो उस दिन कन्या का चन्द्र था । ४

(२) कार्तिक अमावस को चन्द्र जानना है । तिथि १५ X २=३०+३५ (कृष्ण पक्ष होने से)=६५÷५=१३ लब्धि । लब्धि १३ यह १२ से अधिक है तो १३÷१२=शेष १ तुला की संक्रांति कृष्ण चौथ को थी उससे १ गिना तो तुला का चन्द्र आया ।

(३) ज्येष्ठ पूर्णिमा सं० २००० को चन्द्र जानना है । तिथि १५ X २=३०+५ (शुक्ल के)=३५÷५=लब्धि ७ । मिथुन संक्रान्ति १२ तिथि को थी, मिथुन से ७ गिना-सातवां धनु आया, इस कारण इष्ट दिन को धनु का चन्द्र हुआ ।

दूसरी रीति—अमावस्या को सूर्य चन्द्र एक राशि पर रहते हैं तो जो सूर्य की राशि हो वही से सवा दो दिन चन्द्र एक राशि पर रहता है । तिथि में २५ दिन=३ का भाग दो । अर्थात् तिथि X ४ ÷ ९=जो लब्धि होगी, सूर्य की राशि से उतना गिनो तो चन्द्र की राशि जान होगी । जैसे वैशाख शुक्ल १२=१२ X ४ ÷ ९=१५÷९=२ लब्धि । सूर्य वृष का है तो वृष से लब्धि ५ तक गिना तो कन्या राशि आई । इस कारण चन्द्र की राशि कन्या हुई ।

सूर्य को संक्रांति जानना आगे बताया है ।

१८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अध्याय ३६

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति

मासतारीखअंग्रेजी महीनासूर्य की संक्रांतिअंशगति कला
१ भाष२०जनवरीकुंभ१°६१'
२ फाल्गुन१९फरवरीमीन१६०
३ चैत्र२१मार्चमेष१५९
४ वैशाख२०अप्रैलवृष१५९
५ ज्येष्ठ२१मईमिथुन१५८
६ आषाढ़२१जूनकर्क१५७
७ सावन२३जुलाईसिंह१५७
८ भादों२२अगस्तकन्या१५८
९ कुआँर२३सितम्बरतुला१५८
१० कार्तिक२३अक्टूबरवृश्चिक१६०
११ अगहन२३नवम्बरधनु१५९
१२ पूस२२दिसम्बरमकर१५९

यहाँ अंग्रेजी तारीख के अनुसार सायन सूर्य दिया है। इष्ट दिन का सायन सूर्य जानने की रीति—

चक्र में सायन सूर्य की संक्रान्ति और उसकी तारीख इष्ट दिन के समीप की खोजो और उससे इष्ट दिन का अन्तर निकालो। उसी के आगे सूर्य की गति दी है। अन्तर समय की गति स्थूल रूप से निकाल कर उसे चक्र में दिए हुए सायन सूर्य में जोड़ या घटा कर इष्ट दिन का सायन सूर्य जान सकते हो। चक्र में दिए हुए तारीख के पहले का समय हो तो घटाना पड़ेगा, आगे का हो तो जोड़ना पड़ेगा, तब इष्ट दिन का सायन सूर्य निकलेगा।

जैसे १८ मार्च का सायन सूर्य निकालना है। चक्र में देखा अपने इष्ट समय के समीप २१ मार्च दिया है। अब इष्ट दिन और चक्र की तारीख का अन्तर निकालना (चक्र की तारीख २१ मार्च—इष्ट तारीख १८ मार्च)=२१-१८=३ दिन का अन्तर आया। २१ मार्च के आगे गति ५९' दी है। १ दिन में सूर्य ५९' चलता है तो ३ दिन के अन्तर में =५९' × ३=१७७ कला=२°—५७' गति हुई। यह सूर्य की इष्ट काल तक की गति हुई। अर्थात् २१ मार्च के आगे सूर्य का अन्तर २—५७' हो गया। इस गति को चालन कहते हैं। अर्थात् सूर्य को इतना चलना पड़ेगा।

चक्र की तारीख से अपना इष्ट समय पहिले का है, इसलिए यह चालन घटाना पड़ेगा। जहाँ घटाना पड़ता है उसे चालन ऋण कहते हैं। जहाँ जोड़ना पड़ता है उसे चालन धन कहते हैं। इष्ट काल २१ मार्च के आगे का हो तो चालन धन होता

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८३

परन्तु अपनी तारीख २१ मार्च के पहिले की है। इस कारण यहाँ चालन श्रृण हुआ। वक्र में जो दिया है उसे पंक्तिस्थ ( जो पंक्ति में है ) या वक्रस्थ कहते हैं। अब पंक्तिस्थ २१ मार्च के सायन सूर्य को लिया। वह भेद १° पर है = रा ०-१५' इसमें

रा.अं. क. | | से चालन २°-५७' ( चालन श्रृण होने से ) घटाया तो भेद रहा
---|---
०-१-०
०-२-५७
= ११-२८-२

स्पष्ट सायन सूर्य

गणित करने से इष्ट समय का ग्रह आदि निकलता है उसे स्पष्ट ग्रह आदि कहते हैं।

इष्ट कालीन सायन रवि स्पष्ट ११ रा २८° ३' में यदि २° ५७' जोड़ दिया जाय तो वही ० रा १° सायन रवि २१ मार्च का आ जाता है।

यदि घंटा भी दिया है तो उतने घंटे की गति निकाल कर उस चालन का भी + ( धन श्रृण जैसा आवश्यक हो ) करो। घंटे की गति श्रं'राशिक से इस प्रकार निकालेंगे — ६० घड़ी ( एक दिन रात ) में सूर्य की गति उस दिन ५९' ( या जा गति हो ) भी इनमें घड़ी में ( इष्ट घड़ी में ) कितनी होगी ? घंटा की घड़ी बना लो।

जैसे ५ घड़ी की गति निकालनी है ६० घड़ी में ५९' तो ५ घड़ी में

५९ X ५=५९=४' - ५५"गति हुई। मान लो १८ मार्च को१२) ५९ ( ४'
६०=१२४८

सूर्योदय के आगे ५ घड़ी की और गति जाननी है तो इष्ट दिन के बाद की गति होने से जोड़ना पड़ेगा। पहिले का समय होता तो चालन घटाना पड़ता। १८ मार्च के

सूर्य में घड़ी की गति और जोड़ा तो योग ११ रा २८° ३४' ५५" हुआ। अर्थात् उस समय मीन के २८° ३४' ५५" पर सूर्य होगा। सूक्ष्म गणित करने पर १०-१५ कला का अन्तर आ जाता है।

| रा | ° | ' | "
---|---|---|---|---
१८ मार्च को सूर्य | ११ | २८ | ३० | ०
+ ५ घड़ी और | ० | ० | ४ | ५५
योग= | ११ | २८ | ३४ | ५५

यह इष्ट काल का सायन सूर्य

सायन सूर्य में से अयनांश घटा देने से निरयन सूर्य होता है अयनांश निकालना पहिले बता चुके हैं।

सौर मास की संक्रान्ति की तारीख

१८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

सौर मास | संक्रान्ति
(अर/म) | संक्रांति की
तारीख | इसके आगे दिन का हिसाब
---|---|---|---
१ वैशाख | मेव | १३ अप्रैल | लगाने से सौर मास की तारीख
२ ज्येष्ठ | वृष | १४ जुलाई | ( तिथि ) जानी जा सकती है ।
३ आषाढ़ | मिथुन | १४ जून | अर्थात् इस प्रकार बताई हुई
४ श्रावण | कर्क | १६ जुलाई | तारीखों के आगे गिनने पर सौर
५ भाद्रपद | सिंह | १६ अगस्त | मास की तिथि किसी भी इष्ट दिन
६ आश्विन | कन्या | १६ सितम्बर | की निकाल सकते हो । इसमें भी
७ कार्तिक | तुला | १७ अक्टूबर | कभी-कभी एक दिन का अन्तर
८ मार्गशीर्ष | वृश्चिक | १६ नवम्बर | पड़ जाता है । यहाँ अंग्रेजी तारीख
९ पौष | धन | १५ दिसम्बर | के हिसाब से कौन संक्रांति उस
१० माघ | मकर | १३ जनवरी | समय होगी यह साधारण प्रकार से
११ फाल्गुन | कुंभ | १२ फरवरी | जानी जा सकती है ।
१२ चैत्र | मीन | १५ मार्च |

स्थूल रीति से विना पञ्चभाग के चन्द्र साधन ( चन्द्र स्पष्ट करना )

जन्म समय पर किसी ग्रह की ठीक स्थिति इष्टकाल तक गणित द्वारा निकालने से जो जानी जाती है उसी को ग्रह स्पष्ट करना कहते हैं और उस ग्रह के स्पष्ट करने के गणित को साधन ( साधन करने की विधि ) कहते हैं ।

ऊपर सायन सूर्य का साधन करना ( विना पं गङ्ग के ) बताया है, उन्हीं प्रकार यहाँ चन्द्र का साधन करना भी बताते हैं ।

सूर्य और चन्द्र में जब १२ अंश का अन्तर पड़ जाता है तब एक तिथि होती है । इस कारण चन्द्र स्पष्ट करने के लिए उस समय का सूर्य स्पष्ट कर लेना आवश्यक है ।

जैसे वैशाख कृष्ण पंचमी ता० २५ अग्रेल सन् १९४३ ई० के ४ बजे संध्या समय समय चन्द्र स्पष्ट करना है ।

पहले इस दिन का सूर्य स्पष्ट करेंगे । वैशाख में २० अग्रेल को वृष के १ अंश पर चक्र में सायन सूर्य दिया है और गति ५९ कला है । ( २५ अग्रेल-२० अग्रेल ) = ५ X ५९' गति=चालन धन (इष्टकाल पंक्ति के आगे होने से)+हुआ ५ X ५९'=२९५'=२९ अंश-४५' चालन+इष्ट ४ बजे संध्या का है=(१२+४)=१६ बजे इष्ट । यह समय सूर्योदय के बाद का है । मान लो सूर्योदय ६ बजे हुआ । (१६ घण्टा-६ बजे सूर्योदय) १० घण्टा इष्ट । २४ घण्टा में ५९' गति तो १० घण्टा में = ५९ X १० = ५९५' २५ कला के लगभग ।

इन सब को जोड़ा तो इष्ट काल में सायन स्पष्ट रवि=ता १-६अंश-२०'-०' हुआ=(वृष के ६ अंश-२०')

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८५

\begin{array}{r} \text{सूर्य ( वृष १° )} = \text{रा } ० \ १ \\ \qquad \qquad \qquad १ \ १ \ ० \\ ५ \text{ दिन का चालन} + = ० \ ४ \ ५५ \\ \hline \text{योग} = १ \ ५ \ ५५ \\ १० \text{ घंटे का} + = ० \ ० \ २५ \\ \hline = १ \ ६ \ २० \end{array}

इष्ट कालीन सायन रवि

तिथि शुक्ल प्रतिपदा से गिनी जाती है। पूर्णिमा को १५ और अमावस्या को ३० तिथि होती है। अपनी इष्ट तिथि—बैगाख कृष्ण ५ है—१५ शुक्ल पक्ष के १५ गत तिथि कृष्ण पक्ष के—(१५ + ५) = २० + १ = २१ गत तिथि।

१ तिथि = १२° तो २१ तिथि = २१ × १२ अंश = २५२ अंश = रा. १२ अंश

\begin{array}{r} \text{सूर्य स्पष्ट} \quad \text{रा } ० \ ' \\ \qquad \qquad \qquad १ \ ६ \ २० \\ \text{गत तिथि} = ८ \ १२ \ ० \\ \hline \text{प्रातः चन्द्र स्पष्ट} = ९ \ १८ \ ० \\ \hline = \text{मकर का } १८^{\circ} - २०' \end{array}

यह पञ्चमी को सूर्योदय पर चन्द्र की स्थिति हुई और प्रातः काल का सायन चन्द्र हुआ।

चन्द्र की दैनिक गति १२ अंश से १५° तक है अर्थात् साधारण प्रकार से मध्यम गति १४ अंश है। २४ घण्टा में १४ अंश गति है तो आधे दिन की संख्या तक ७ अंश हुई है। १ घण्टा में लगभग ३५' गति हुई। यहाँ ४ बजे संख्या की गति निकालनी है। मान लो सूर्योदय ६ बजे हुआ तो सूर्योदय से इष्ट काल तक १० घण्टा हुआ। १ घण्टा में ३५' तो १० घण्टा में = ३५' × १० = ३५०' = ५ अंश — ५०' गति हुई। यहाँ चालन + है।

\begin{array}{r} \text{रा } ० \ ' \\ \text{प्रातः चंद्र स्पष्ट} \quad १ - १८ - २० \\ १० \text{ घण्टे का चालन} + ० - ५ - ५० \\ \hline \text{इष्ट कालीन} \quad \left. \vphantom{० - ५ - ५०} \right\} = १ - २४ - १० \\ \text{सायन चंद्र स्पष्ट} \quad \left. \vphantom{० - ५ - ५०} \right\} = \text{मकर का } २४ \text{ अंश} - १०' \end{array}

इस प्रकार ४ बजे तक चंद्र मकर के २४ अंश—१०' पर हुआ। यह स्थूल मान से चन्द्र स्पष्ट हुआ। सूक्ष्म रीति से गणित करने में लगभग ११ कला का अन्तर पड़ जाता है।

( सायन चन्द्र—अयनोश ) = निरयन चंद्र।

१८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चंद्र साधन करने का दूसरा उदाहरण

तारीख २५ मई के ६ बजे संध्या का चन्द्र स्पष्ट करना है; ज्येष्ठ कृष्ण पञ्चमी का।

२१ मई की सूर्य-मिथुन १ अंश गति ५८'=इष्ट-२५ मई को ६ बजे संध्या= चालन+ (२५ मई-२१ मई)=४ X ५८' गति=२३३'=३अंश—५२ चालन+। ६ बजे संध्या इष्ट है। मान लो सूर्योदय ६ बजे है, ६ बजे से १२ घण्टा हुआ। २४ घण्टा में ५८' तो १२ घण्टा में २९' गति हुई। इन सबको जोड़ा तो इष्ट कालीन सायन सूर्य स्पष्ट २ रा-५अंश-२१' हुआ।

सूर्य मिथुन १ अंश=रा-१अंश-०'

चार दिन का चालन+०-३-५२

१२ घण्टे का ,, +०-०-२९

इष्ट कालीन } =२-५-२१

सूर्य स्पष्ट }

तिथि ज्येष्ठ ५ है=शुक्ल पूर्णिमा=१५+कृष्ण पञ्चमी तक गत तिथि ४=१५+४=१९ दिन।

१ तिथि में १२' तो १९ तिथि में=१९ X १२ अंश=२२८ अंश=३ रा. १८ अंश रा ० ,,

सायन सूर्य-२-५-२१ १ दिन की चन्द्र की मध्यम गति (औसत गति) १४°

तिथि के अंश+७-१८-० है तो १२ घण्टा ( ३ दिन की ७°

=चन्द्र स्पष्ट=९-२३-२१=चतुर्थी के अन्त तक का।

आधे दिन का+२-०-७-०

इष्ट कालीन } =१-०-०-२१=कुंभ के ०°-२१' पर चन्द्र है।

सायन चंद्र स्पष्ट } =इष्ट कालीन सायन चन्द्र कुंभ के ०°-२१' पर है।

चंद्र साधन करने की दूसरी रीति—

चंद्र की मध्यम गति १२ अंश है कोई १४ अंश लेते हैं। रवि और चंद्र में १२° अंश का अन्तर पड़ने पर १ तिथि होती है, शेष २ अंश मध्यम गति के हैं। उसके मिला देने से चंद्र के अंश ज्ञात हो जाते हैं।

अधिक मध्यम गति का अन्तर इस प्रकार से होता है।

तिथि प्रतिपदा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी पञ्चमी से द्वादशी शेष तिथि में

अन्तर२°४६५३३२°
तिथि पूर्णिमा सेएकादशी से
कृष्ण पञ्चमी तक अमावस्या तकचंद्र स्पष्ट करने के लिएसूर्य स्पष्ट में
अन्तर३ अंश३ अंशतिथि के अनुसार ये अंश मिला देने चाहिए। चंद्र की गति प्रति दिन १२ अंश के १५ तक २° बढ़ जाती है। इसी के

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८७

कारण साधारण रीति से अधिक बड़े हुए अंश ऊपर जोड़ना बताया है। इस रीति से चन्द्र स्पष्ट करने में १° के लगभग अन्तर पड़ जाता है, परन्तु ३° से अधिक अन्तर नहीं आता। तिथियाँ १ मास में पूरी ३० नहीं होती। इससे ये अंश बढ़ जाते हैं।

जैसे सन् १९४३ में २५ मई को तदनुसार ज्येष्ठ वद्यी ६ को १२ बजे दिन का चंद्र साधन करना है। १२ बजे दिन अर्थात् सूर्योदय से लगभग ६ घंटा हुआ।

२१ मई को सायन रवि=मिथुन १° गति ५८' इष्ट २५ मई का है। आगे का होने से चालन घन हुआ।

( २५ मई-२१ मई ) = ४ दिन X ५८' गति=२३२'=३° - ५२'=३° - ५२'-०'अंश
२४ घटा में ५८' गति तो ६ घंटा में=५८'=१४३' +०-१४-३०

रा-०

२१ मई को सूर्य २-१°-०'
+ चालन ०-४-६३'

४-६॥ चालन +

=सायन सूर्य=२-५-६३'

रा ०

६ तिथि है=गति तिथि ५=५ X १२°=६०°=२-०°
+ पंचमी के अन्त =२-०-०

तक चन्द्र योग ४-५-६३'

+०-३-०

पंचमी की बढ़ती के अंश

+०-३-०

छठ ,, ,, "

योग=४-११-६३' ( क्योंकि छठ उदय है )

६ घंटा का + =३-३० २४ घंटा में चन्द्र १४ अंश चला तो ६ घंटा में

चन्द्र स्पष्ट=४-१५-३६५' ७ १४ X ६ ७°
२४ = ३°-३०'
४२

∴ इष्ट कालीन सायन चन्द्र स्पष्ट ४-रा १४°-३६५°

यह कुछ मोटा हिसाब है। गणित से १-२ अंश का अन्तर पड़ जाता है। सायन चन्द्र से अयमांश घटा दो तो निरयन चन्द्र होगा।

चंद्र से नक्षत्र और उसका चरण साधन करना

चंद्र स्पष्ट की राशि आदि की कला बना कर १३ अंश-२०'=८००' का भाग दो तो लब्धिगत नक्षत्र होगा। शेष में ४ गुणाकर ८००' का भाग दो तो वर्तमान नक्षत्र का चरण निकलेगा। १ नक्षत्र में ४ चरण होते हैं। सायन नक्षत्र १३°-२०' का

१८८ : सचित्र व्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

होता है और अथिनी से आरम्भ होता है। जैसे चंद्र मकर का २९°-५२' है। = ९२-२९°-५२' = १७९९२" ÷ ८००' = २२ गत नक्षत्र (श्रवण) वर्तमान २३ वां नक्षत्र धनिष्ठा का २ चरण।

रा. अं. क.८००' ) १७९९२" ( २२ गत नक्षत्र
९-२९-५२१६००
× ३०१९९२
२७०१६००
+ २९३९२
२९९× ४
× ६०८०० ) १६६८ ( १ गत
१७९४०८०० चरण
+ ५२७६८ शेष
१७९९२ विकला= वर्तमान दूसरा चरण हुआ

किसी राशि के नाम पर से जन्म नक्षत्र और चरण जानना—

आगे होड़ा चक्र दिया है जिस पर से हिन्दुओं के नाम विचार कर रखे जाते हैं। प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण होते हैं और प्रत्येक चरण के लिए एक अक्षर नियुक्त है। जन्म समय जो नक्षत्र होता है उस नक्षत्र का जो चरण वर्तमान हो उसी चरण के अक्षर के अनुसार नाम रखा जाता है। जैसे किसी का जन्म शतभिषक नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ तो चक्र में देखने से प्रगट हुआ कि शतभिषक के तीसरे चरण का अक्षर 'सी' है। इसी अक्षर पर से सीताराम, शिगुपाल आदि नाम उस वालुक का रखा जावेगा। स अक्षर में श अक्षर भी लिया जा सकता है। वह ह्रस्व हो या दीर्घ हो उसका कुछ विचार नहीं होता। यहाँ सी अक्षर है इसमें "छोटी इ" की भी मात्रा हो तो कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। इसमें केवल अक्षर और मात्रा का विचार होता है। मात्रा ह्रस्व हो तो उसे दीर्घ भी ले सकते हैं जैसे कू और कु एक है। इसी प्रकार म और मा एक है। मचा के पहले चरण का जन्म होता है म अक्षर है तो मक्खन सिंह या माशती प्रसाद भी नाम रख सकते हैं।

कई अक्षर ऐसे भी हैं जिन पर से नाम नहीं रखा जा सकता है जैसे ड. ल. ण. जव ये अक्षर आते हैं तो नाम "न" अक्षर या किसी दूसरे अक्षर से रख देते हैं।

इसी प्रकार किसी राशि के नाम पर से नाम के आदि अक्षर का विचार कर जन्म नक्षत्र या राशि भी जान सकते हैं। जैसे किसी का नाम रामलाल है। नाम का आदि अक्षर रा है। चक्र देखा तो तुला राशि के आगे चित्रा के तीसरे चरण का जन्म है और तुला राशि है।

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८९

इस चक्र से किसी ग्रह की राशि अंश कला आदि मालूम हो तो उसका नक्षत्र और चरण भी जाना जा सकता है।

जैसे जन्म समय चन्द्र स्पष्ट १२।२९°-५२' है तो यह जानने के लिए कि जन्म नक्षत्र और चरण क्या होगा, होड़ा चक्र का अन्तिम भाग देखो। १२।२६°-४०' तक धनिष्ठा का पहला चरण गत हो चुका, धनिष्ठा का दूसरा चरण १०।०°-०° तक है। अपना चन्द्र इन दोनों के भीतर है इससे यह प्रगट हुआ कि धनिष्ठा के दूसरे चरण का जन्म है।

नक्षत्र का चरण (जैसे नाम से प्रगट हो जाता है) जान लेने पर इसी चक्र द्वारा चन्द्र की राशि अंश आदि भी विदित हो सकता है।

जैसे किसी का जन्म धनिष्ठा के तीसरे चरण का है तो तीसरे चरण धनिष्ठा का १३।३°-२०' तक है। दूसरा चरण १०।०°-०' तक है। इस कारण चंद्र इन दोनों के बीच है ऐसा समझना। चंद्र की ठीक स्थिति तो गणित करने से ही प्रगट होती है। यहाँ केवल मोटा हिसाब बतलाया है। गणित खण्ड में इसका गणित दिया है।

होड़ा चक्र को अब कहड़ा चक्र या शतपद चक्र भी कहते हैं।

१ चरण (नक्षत्र का) ३°-२०' का होता है। आगे ३°-२० जोड़ते जाने से राशि के अंशादि का चक्र बन जाता है।

इसमें एक अक्षर को लेकर प्रत्येक चरण के लिए पृथक् मात्रा लगा कर चरण के अक्षर बनाये गये हैं। जैसे ल से ला, ली, लू, ले, लो इत्यादि जैसा नीचे के चक्र से प्रगट होगा।

१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

0 ७ ०--०--३ >] oe ० २

०८९८-१८-००, ०-०९--४ ०४--१७--५ 2: pl (४

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1 ४७ 201218-9:2- 122५2121६३५४५२ 128

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साथन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १११

६ कल्या४० फा००टो पापी०५-३-२०५-६-४०५-१०-०
हस्तपूव गठा५-१३-२०५-१६-४०५-२०-०५-२३-१०
चिनावेपो०५-२६-४०६-०-०००
७ तुलाचिना०यारी००६-३-२०६-६-४०
स्वातो०रेता६-१०-०६-१३-२०६-१६-४०६-२०-०
विशाखातीतू तो०६-२३-२०६-२६-४०७-०-००
८ वृश्चिकविशाखा००तो०००७-३-२०
बहुपाधानानी नूने७-६-४०७-१०-०७-१३-२०७-१६-४०
ज्येष्ठानोया गीयू७-२०-०७-२३-४०७-२६-४०८-०-०
९ धनमूलयेगो माभी८-३-२०८-६-४०८-१०-०८-१३-२०
पू० भा०भूच फाठ८-१६-४०८-२०-०८-२३-२०८-२६-४०
उ० भा०भे००९-०-००००
१० मकरउ० भा००भो जाजी९-३-२०९-३-२०९-६-४०९-१०-०
अनखीछू खेखो९-१३-२०९-१६-४०९-२०-०९-२३-२०
धनिष्ठागागी०९-२६-४०१०-०-०००
११ कुम्भधनिष्ठा००ने००१०-३-२०१०-६-४०
शतभि०गो सासीसू१०-१०-०१०-१३-२०१०-१६-४०१०-२०-०
पू० भाद्र०सेसो वा०१०-२३-२०१०-२६-४०११-०-००
१२ मीनपू० भाद्र०००दो०००११-३-२०
उ० भा०डुब घब११-६-४०११-१०-०११-१३-२०११-१६-४०
रेवतीवेदो वाची११-२०-०११-२३-२०११-२६-४०१२-०-०

११२ : सचित्र व्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस चक्र में

अक्षर के आगे ठहर नक्षत्र का क्रम और नीचे चरण के अंक दिये हैं । नक्षत्र क्रम से

यहाँ दिये हुए नक्षत्र का नाम प्रकट हो जायगा ।

इनमें ये अक्षर बराबर हैं—

अ=आ ई=ई उ=ऊ ए=ऐ ओ=ओ अ=अः स=सा व=व

जो नहीं हैं अक्षर

घो घू घे घो

छो छू छे छो जो जो जो झो झू झे झो

ठो ठू ठे ठो

होड़ा चक्र के अक्षर और उनका नक्षत्र चरण सूचक चक्र

नक्षत्र

अक्षर जो हैं

क्रमनामअआइईउऊएऐओअःसःवः
१अश्वि.बा३/१इ३/२उ३/३ए३/४ओ४/१
२शरणीका५/३की५/४कू६/१के७/१को७/२
३कृत्तिकाखी२२/१खू२२/२खे२२/३खो२२/४
४रोहिणीगा२३/१गी२३/२गू२३/३गे२३/४गो२४/१
५मृग.घा६/२
६आर्द्राछ६/३
७पुन.चा२७/३ची२७/४चू१/१चे१/२चो१/३
८पुष्यऊ६/४
९आश्ले.जा२१/३जी२१/४
१०मघाझ२६/३
११पू. फाज२६/४
१२उ. फा.टा११/२टी११/३टू११/४टे१२/१टो१२/२
१३हस्तठ१३/४
१४चित्राडा६/४डी६/१डू६/२डे६/३डो६/४

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १९३

१५ स्वाता.ठ २०/४डी द ठे दो प=खजव हुस्त के
१६ विमल.प १२/४भी भू बे धो धोदूसरे चरण का
१७ मनु.क २४/३ ती १६/१ तु १६/२ ते १६/३ तो १६/४धी धू घे धीजन्म होता है तो
१८ कल.क २६/३व अक्षर होने से
१९ मृग.क २६/३ ती २४/४ दू २६/१ दे २७/१ दो २७/२उसे ख मालकर
२० मृ. घन.क २०/२नाम रख देते हैं
२१ ठ. मल.ता १७/१ ती १७/२ तु १७/३ ते १७/४ ती १८/१जीसे—
२२ खल.पा १२/१ ती १२/४ प्र १२/१ ते १४/१ ती १४/२पराराध=
२३ घति.पा २०/३फी फू फे फोखरागम
२४ शत.भ १८/३ भी १४/४ भू २०/१ ये २१/१ भी २२/२षडान्त=
२५ पू. पा.भा १०/१ भी १०/२ भू १०/३ ये १०/४ भी ११/१खंडान
२६ ल. भा.भा १५/२ ती १५/३ भू १५/४ ये १५/१ भी १५/३
२७ श्वतीरा १४/३ ही १४/४ क १४/१ दे १४/२ दो १४/३
ल १/४ लो २/१ लू २/२ ले २/३ लो २/४
वा ४/२ ली ४/३ लू ४/४ वे ४/१ लो ४/२
व १२/२
सा २४/२ ली २४/४ भू २४/२ वे २४/१ लो २४/२

क. अ. प्र. = इन अक्षरों से नाम नहीं बनता तो इसके बदले "न" या सौर कोई भी अक्षर नाम रख देते हैं।

१३