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रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

सूत्रेण बंधयेद्धस्ते वामे स्त्री दक्षिणे पुमान् ॥

श्री: क१/298
रुद्रयामलतन्त्रम्
भाषाटीकासहित
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अथ रुद्रयामलं च कथयामि विशेषतः ॥
गौरीं सरस्वतीं शंभुं प्रणम्य शिरसा पृथक् ॥ १ ॥
अब हम गौरी तथा सरस्वती और शंभुजीकोशिरसे अलग अलग प्रणाम
करके रुद्रयामल कहते हैं ॥१॥
तत्रादौ सर्वजनानां वशीकरणमुत्तमम् ॥
यतचित्तेन च जपेन्मंत्रं विंशसहस्रकम् ॥ २ ॥
इसमें आदिमें सब जनोंका वशीकरण कहते हैं । उत्तम यतचित्त होकर
बीस हजार मंत्र जपे ॥२॥
चंदनं वटमूलं च जलेन पेषयेत्समम् ॥
विभूतिसंयुक्तकृतं भाले तिलकमेव च ॥ ३ ॥
चंदन, वटकी मूल जलमें पीस समान विभूति मिलाके मस्तकमें तिलक
देवे तो वश्य होय ॥३॥
पुष्ये पथर्संगामूलं रुद्रवंतीं तथैव च ॥
जवमूलं समादाय कुमार्या सूत्रनिर्मितम् ॥ ४ ॥
सूत्रेण बंधयेद्धस्ते वामे स्त्री दक्षिणे पुमान् ॥
तदा सर्वे वशीभूता भविष्यंति न संशयः ॥ ५ ॥

४ रुद्रयामलतन्त्रम्
पुष्यनक्षत्रमें यथसंगाकी मूल रुद्रवंती जवकी मूल ले कुमारीके काते
सूतमें पुरुषके दहिने स्त्रीके बांये हाथमें बांधे तो सब वशीभूत होंय इसमें संदेह
नहीं है ॥४॥५॥
मंत्रः। ॐयँपरक्षोभयंभगवती गंभीर रेछ स्वाहा ॥
अंधझारस्य मूलं च गोरोचनसमन्वितम् ॥
जलेन पेषयेच्चैव तिलकं कारयेद्बुधः ॥
त्रैलोक्यं च वशीभूतं नात्र कार्याविचारणा ॥ ६ ॥
इस मंत्रका २०००० जप करे । आंधे झारकीमूल गोरोचन मिलाय
कर पानीमें पीसकर तिलक करे तो तीन लोक वश होंय इसमें विचार न करना
॥६॥
मंत्रः ॐ नमो नमो कदसंवारीनि सर्वलोकवश्यकरी स्वाहा ॥
अष्टोत्तरशतं चैव जपेन्मंत्रं समाहितः ॥
मंत्रसिद्धिस्तदा यातः सर्ववश्यकरः परः ॥ ७ ॥
इस मंत्रका १०८ जप करे तो मंत्रसिद्धि होती है, सब वश्य होते हैं ॥७॥
शनैश्चरोपवासं च कृत्वा च विधिपूर्वकम् ॥
उत्तराभिमुखो भूत्वा चोद्धृत्य च शुचि तरुम् ॥ ८ ॥
शनिका व्रत कर विधिसे उत्तरमुख बैठके इंद्रायनको उखाडे ॥८॥
पंचांगु च समानीय च्छायाशुष्कं तु कारयेत् ॥
पिष्ट्वा शुंठीं पिप्पलीं च मरिचं च समानयेत् ॥ ९ ॥
पंचांग ले छायामें सुखाके पीसकर सोंठ पिप्पली मिरच मिलाकर ॥९।
अजामूत्रेण संपेष्य छायाशुष्कां वटीं न्यसेत् ॥

हिन्दीटीकासहितम् ५
रक्तचंदनपानीयं तेनैव नाम वै लिखेत् ॥
सोपि वश्यो भवेत्सद्यो नात्र कार्याविचारणा ॥ १० ॥
बकरीके मूत्रमें पीस वटी बनाके छायामें सुखावे और रक्तचंदनके
पानीसे घिस नाम लिखे सो वश होय इसमें कुछ विचार नहीं है ॥१०॥
देवदारुं चंदनं च वटिकां च तथैव च ॥ ११ ॥
जलेन पेष्य पंचैव खादयेत्सुमाहितः ॥
सोऽपि वश्यो भवत्येव महादेव प्रसादतः ॥ १२ ॥
देवदारु सफेद चंदन और वटी जलमें पीस खवावे तो वह महादेवके
प्रसादसे वश्य होय ॥११॥१२॥
पुनर्वटीं समादाय गोरोचनसमन्विताम् ॥
जलेन तिलकं कृत्वा यत्र गच्छति सिद्धिदः ॥ १३ ॥
फिर वटी और गोरोचन जलमें मिलाकर तिलक करे तो जहां जाय
तहां सिद्धि होय ॥१३॥
मंत्रः । ॐ नमः सर्वार्थसाधनी स्वाहा ।
मंत्रेदं प्रथमं जप्त्वा सहस्रवारकम् ॥
कार्यसिद्धिकरं चैव सर्वथा सिद्धिकारकम् ॥ १४ ॥
इस मंत्रको १००० जपे तो कार्यसिद्धि होय ॥१४॥
अन्यप्रयोगः
कृष्णपक्षस्य चाष्टम्यं चतुर्दश्यामुपोष्य वै ॥
र्बलि दत्त्वा च चौद्धृत्य सहदेवी समाहितः ॥ १५ ॥
कृष्णपक्षकी अष्टमी वा चतुर्दशीका व्रत कर सहदेईको उखाडे ॥१५॥

रुद्रयामलतन्त्रम्
चूर्णयित्वा च यं चैव तांबूलेनैव खादयेत् ।।
सोऽपि वश्यो भवेत्सद्यो भगवत्याः प्रसादतः ।। १६ ।।
चूर्ण कर तांबूलमें खवावे तो भगवतीके प्रसादसे वश्य होय ॥१६॥
स्नानं कृत्वा तु यत्नेन यस्योपरि च क्षिपेत् ।।
गोरोचनेन संयुक्तां सहदेवीं जलेन व ।। १७ ।।
तिलकं कृत्वा तु भाले वशीभूतास्तथापि च ।।
सहदेवीचूर्णकं च मस्तके यस्य निक्षिपेत् ।।
सोपि वश्यो भवेत्सद्यो नात्र कार्या विचारणा ।। १८ ।।
स्नान कर जिसके ऊपर छोड देय सो वश्य होय ।
गोरोचन सहदेवी जलमें मिलाकर मस्तकमें तिलक करे और जिसके
सामने जाय तो वश्य होय वा सहदेवीका चूर्ण मस्तकपर छोड़ देय तो शीघ्रही
वह वश होय इसमें संशय नहीं ॥१७॥१८॥
सहदेव्याश्च मूलं च मुखे निक्षिप्य यत्नतः ॥ १९ ॥
सहदेवीका मूल यत्नसे मुखमें राखे तो वश्य होय ॥१९॥
कुमारीनिर्मिते सूत्रे मूलं संबध्य यत्नतः ॥
स्त्रियाः कट्यां च बंधेत तदा भोग्यवती भवेत् ।। २० ।।
कुमारीके काते सूत्रमें मूल बांध स्त्रीके कटिमें बांधे तो स्त्री भोगके
योग्य होय और वश्य होय ॥२०॥
मंत्रः ॥ ॐ नमो भगवती मंगलेश्वरी-
सुखरालिनी सर्वधरंमातंगी कुमारीक लघु
लघु वलं कुरु कुरु स्वाहा। सहस्रं च
जपेन्मंत्रं तदा सिद्धिर्भविष्यति ।। २१ ।।
इस मंत्रको १००० पहिले जपे तो सिद्धि होय ॥२१॥

हिन्दीटीकासहितम् ७
अन्यप्रयोगः । क१/२१४
श्वेतशरपुंखमूलं पेषयेच्च जलेन वै ।।
चंद्रस्य ग्रहणे चैव समुद्धृत्य विधानतः ।। २२ ।।
चंद्रके ग्रहणमें विधानसे सफेद सरपुंखाकी जड लाकर जलके संग पीसे
।।२२।।
नेत्रे चैवांजनं कुर्यात्सर्वथा विधिना तथा ।।
जगत्त्रयं तदा वश्यं राजानश्च प्रजास्तथा ।। २३ ।।
और नेत्रोंमें अंजन करे तो तीन लोकमें राजा प्रजा वश्य होय ।।२३।
मुस्तामूलं समादाय मुखे संस्थाप्य यत्नतः ।।
यस्य नाम च संब्रूयात्सोऽपि वश्यो भवेत्तदा ।। २४ ।।
मुस्ताकी जड मुखमें रख जिसका नाम लेय सो वश्य होय ।।२४।।
मनःसिलं गोरोचनं मुस्तामूलं जलेन वा ।।
तिलकं कारयेद्योपि नाम ब्रूयाद्यथा हि सः ।। २५ ।।
मनसिल, गोरोचन, मुस्ताकी जड़ जलमें पीस तिलक कर जिसका
नाम ले सो वश्य होय ।।२५।।
मुस्तामूलं सुवर्णेन बध्नाति दक्षिणे करे ।।
तदा प्राणसुखी भूयात् धनं च बहुधा भवेत् ।। २६ ।।
मुस्ताकी जड सुवर्णमें मढाय दक्षिण हाथ में बांधे तो प्राण सुखी रहे
तथा बहुत प्रकारका धन होय ।।२६।।
मुस्तामूलं चंदनेन तिलकं च विधानतः ।।
कृत्वा तस्य दर्शनाच्च वशीभूतो नरोथवा ।। २७ ।।

८ रुद्रयामलतन्त्रम्
मुस्तामूलको चंदनमें मिलाकर तिलक करे तो जो देखे सो नर वा स्त्री
वश्य होय ॥२७॥
मंत्रः । ॐ वज्रकरण शिवे रुध रुध भवे
ममाई अमृत कुरु कुरु स्वाहा ।
सहस्रैकं जपेन्मंत्रं पश्चाच्च गृह्णात्यौषधीम् ॥
तदा सिद्धिर्भवेत्तस्य नान्यथा सिद्धिरुच्यते ॥ २८ ॥
इस मंत्रको हजार वार जपे पीछेसे औषध ले तो सिद्ध होय और तर-
हसे सिद्धि नहीं कही है ॥२८॥
उच्छिष्टचांडालीप्रयोगः ।
एकांते भोजनं चैव कुंकुमादिसमन्वितम् ॥
केशरं चंदनं चैव गोरोचनमथापि च ॥ २९ ॥
गोदुग्धेन समाश्लिष्य कर्पूरेण समन्वितः ॥
एषां तिलकमात्रेण नृपो वश्यो भवेत्तदा ॥ ३० ॥
एकांतमें भोजन करे, कुंकुम, केशर, गोरोचन, चंदन, कर्पूर, गोदुग्धमें
मलाकर तिलक करे तो राजा वश्य होय ॥२९॥३०॥
मंत्रः । उच्छिष्टेच्छिष्टा चांडाली सती वाकं
कुरु मंत्रय स्वाहा॥ मंत्रणानेन चाश्लेष्य चौषधीं च विशेषतः ॥३१॥
इस मंत्रसे औषधि अभिमंत्रित करे तब सिद्ध होय ॥३१॥
मंत्रः । ॐ ह्रीं अमुकं मे वश्यं कुरु कुरु स्वाहा ।
मंत्रेदं तु सहस्रैकं जप्त्वा पूर्वं समाहितः ॥ ३२ ॥
वटीं बध्नात्यौषधीनां वदत्यन्यस्य नामक्रम् ॥
जलेन तिलकं कृत्वा तदा वश्यो भवेन्नृपः ॥ ३३ ॥

हिन्दीटीकासहितम् ९
इस मंत्रको पहिले हजार वार पढ़कर फिर औषधियोंकी वटी बनाकर
जिसका नाम ले तिलक करे तो वह राजा वश होय॥३२॥३३॥
घृतं दुग्धं शर्करां च दधिमधुकमेव च ॥
कमलपुष्पपत्राणि शतानि च विशेषतः ॥
रात्रौ च हवनं कुर्याच्चक्रवर्तीवशो भवेत् ॥ ३४ ॥
घृत दुग्ध शक्कर दही सहत कमलपुष्पके पत्र १०० रात्रिको हवन करे
तो चक्रवर्ती वश होय ॥३४॥
गोभीं मयूरशिखां च मुखे वा शिरसि क्षिपेत् ॥
वादे चैव तथा वेदे जयमाप्नोति मानवः ॥ ३५ ॥
गोभी मयूरशिखा मुखमें वा शिरमें रखे तो वादमें वा वेदमें जय पावे
॥३५॥
मार्गशीर्षस्य पूर्णायां मूलमुद्धृत्ययत्नतः ॥
मयूरपिच्छस्य बध्नीयाद्धस्ते वा मस्तके तथा ॥
तदा वादेषु सर्वेषु जयमाप्नोति नित्यशः ॥ ३६ ॥
अगहनीपूनौको मोरशिखाकी जड़ यत्नसे उखाड़ हाथमें वा मस्तकमें
बांधे तो सबवादोंमें जय पावे ॥३६॥
मंत्रः । ॐ नमः कनर्कापगे रौद्रकृपातरु-
ष्टास्त्रधरनी तिष्ठ सरासरसत्वानं मोहये
भगवतीसिधिधुजो इति मीठमहामाये स्वाहा ॥
अष्टोत्तरशतं जप्त्वा तदा सिद्ध्यतिमंत्रराट् ॥ ३७ ॥
यह मंत्र एक सौ आठ वार जपे तो मंत्र सिद्ध होय ॥३७॥
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