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सर्वकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहितम् ५
रक्तचंदनपानीयं तेनैव नाम वै लिखेत् ॥
सोपि वश्यो भवेत्सद्यो नात्र कार्याविचारणा ॥ १० ॥
बकरीके मूत्रमें पीस वटी बनाके छायामें सुखावे और रक्तचंदनके
पानीसे घिस नाम लिखे सो वश होय इसमें कुछ विचार नहीं है ॥१०॥
देवदारुं चंदनं च वटिकां च तथैव च ॥ ११ ॥
जलेन पेष्य पंचैव खादयेत्सुमाहितः ॥
सोऽपि वश्यो भवत्येव महादेव प्रसादतः ॥ १२ ॥
देवदारु सफेद चंदन और वटी जलमें पीस खवावे तो वह महादेवके
प्रसादसे वश्य होय ॥११॥१२॥
पुनर्वटीं समादाय गोरोचनसमन्विताम् ॥
जलेन तिलकं कृत्वा यत्र गच्छति सिद्धिदः ॥ १३ ॥
फिर वटी और गोरोचन जलमें मिलाकर तिलक करे तो जहां जाय
तहां सिद्धि होय ॥१३॥
मंत्रः । ॐ नमः सर्वार्थसाधनी स्वाहा ।
मंत्रेदं प्रथमं जप्त्वा सहस्रवारकम् ॥
कार्यसिद्धिकरं चैव सर्वथा सिद्धिकारकम् ॥ १४ ॥
इस मंत्रको १००० जपे तो कार्यसिद्धि होय ॥१४॥
अन्यप्रयोगः
कृष्णपक्षस्य चाष्टम्यं चतुर्दश्यामुपोष्य वै ॥
र्बलि दत्त्वा च चौद्धृत्य सहदेवी समाहितः ॥ १५ ॥
कृष्णपक्षकी अष्टमी वा चतुर्दशीका व्रत कर सहदेईको उखाडे ॥१५॥