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रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 68 में से

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पृष्ठ 57

हिन्दीटीकासहितम् ५५
सूच्या पारदेषु छिद्रं समवकारयेत् ॥ तद्वि
ष्ठां लेपयेच्छिद्रे भोजनार्थं तु यत्नतः ॥ ४९ ॥
ओदनादिकमाधाय यदंडानि बिभेद सा ॥
तदा गृह्णीयात्पारदं गुटिकां समकारयेत् ॥
मुखे निधाय गुटिकां गच्छेद्द्वादशयोजनम् ॥ ५० ॥
३ टंक पारा चिल्हरिके घुरघुच्चेमें धर दे और जब इसके अंडा होय
तब बारीक सूचीसे पारे में छेद कर चिल्हरिके विष्ठासे लेप कर छिद्रमें लपेट
देवे और भोजनके अर्थ भात धर दे और नीडमें जब अंडा फोरे तब पारा उठाय
वटिका बनाके मुखमें धारण करे तो बारह योजन चले ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ ५० ॥
ॐ ह्रीं ह्रीं हूं फट्‌चीलावक्त्रे सुरं पारात्परे
पादुकागमनं देहि देहि मे स्वाहा । मंत्रेण
पूजयेच्चैव गुटिकां सुविधानतः ॥ अमृतसं-
जीवनविधि महादेवेन भाषितम् ॥ ५१ ॥
पहिले गुटिका लाकर इस मंत्रसे पूजन करे। यह अमृतसंजीविनीविधि
श्रीमहादेवजीने कही है। पूजन करके जब २ मुखमें धरे तब २ बारह योजन
चले ॥ ५१ ॥
महादेवस्य लिंगैकं पूजयेदंकोलसंनिधौ ॥
जलपूर्णं घटं चैव तत्रैव च निधापयेत् ॥ ५२ ॥
पूजयेलिंगं पृथक् पृथक् स्थाप्य पुनः पुनः ॥
प्रहरे प्रहरे चैव पूजयेद्दिनरात्रिकम् ॥
यावॅल्लिंगं प्रजयोच्च ह्यघोरेण समं ततः ॥ ५३ ॥