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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 957, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 957

अयमुशानः पर्यद्रिमुस्रा ऋतधीतिभिर्ऋतयुग्युजानः.
रुजदरुग्णं वि वलस्य सानुं पर्णीर्वचोभिरभि योधदिन्द्रः.. (२)
इन इंद्र ने पर्वत के द्वारा घिरी हुई गायों के उद्धार की इच्छा से यज्ञ करने वाले
अंगिरागोत्रीय ऋषियों की सच्ची स्तुतियों से प्रभावित होकर असुर को सहायता करने वाले
पर्वत को तोड़ा एवं अपने प्रसिद्ध आयुधों से पणियों से युद्ध किया. (२)
अयं द्योतयदद्युतो व्य१क्तून्दोषा वस्तोः शरद इन्दुरिन्द्र.
इमं केतुमदधुर्नू चिदह्नां शुचिजन्मन उषसश्चकार.. (३)
हे इंद्र! इस सोमरस ने दीप्तिरहित रात, दिन, वर्ष आदि को प्रकाशित किया था. देवों ने
पहले सोम को दिवसों के झंडे के रूप में स्वीकार किया था. इसी सोमरस ने उषाओं को
शोभनजन्म वाली बनाया था. (३)
अयं रोचयदरुचो रुचानो३यं वासयदव्यृ१ तेन पूर्वीः.
अयमीयत ऋतयुग्भिरश्वैः स्वर्विदा नाभिना चर्षणिप्राः.. (४)
इन्हीं दीप्तिशून्य इंद्र ने सूर्य के रूप में प्रकाशित होकर सब लोकों को प्रकाशयुक्त एवं
तेज के द्वारा उषाओं को तेजपूर्ण किया था. प्रजाओं की अभिलाषाएं पूरी करने वाले इंद्र ने
स्तुतियों के अनुसार चलने वाले घोड़ों से खींचे गए एवं धन प्राप्त करने वाले रथ पर बैठकर
गमन किया था. (४)
नू गृणानो गृणते रत्न राजन्निषः पिन्व वसुदेयाय पूर्वीः.
अप ओषधीरविषा वनानि गा अर्वतो नॄन्चसे रिरीहि.. (५)
हे प्राचीन एवं तेजस्वी इंद्र! तुम स्तुति सुनकर धन के पात्र स्तोता को अधिक अन्न दो.
तुम उसे जल, ओषधियां, विषहीन वन, गाएं, घोड़े एवं सेवक प्रदान करो. (५)
सूक्त—४० देवता—इंद्र
इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायाव स्य हरी वि मुचा सखाया.
उत प्र गाय गण आ निषद्याथा यज्ञाय गृणते वयो धाः.. (१)
हे इंद्र! यह सोम तुम्हारा नशा बढ़ाने के लिए निचोड़ा गया है. तुम इसे पिओ. अपने
मित्ररूप घोड़ों को रथ में जोतो एवं यात्रा के बाद उन्हें छोड़ दो. तुम स्तोताओं के बीच बैठकर
स्तुतियां गाओ एवं अपने स्तोता को अन्न दो. (१)
अस्य पिब यस्य जज्ञान इन्द्र मदाय क्रत्वे अपिबो विरप्शिन्.
तमु ते गावो नर आपो अद्रिरिन्दुं समह्वन्पीतये समस्मै.. (२)