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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 871, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 871

अध व्रतेव मानुषं स्वर्णी धायि दर्शतम्.. (२)
हे मित्र व वरुण! तुम्हारी शक्ति असुर विनाशिनी एवं विरोधरहित है. तुम्हारा महान् बल
व्याप्त है. सूर्य जैसे आकाश में दीखता है, वैसे ही तुम अपनी दर्शनीय शक्ति यज्ञ में स्थापित
करो. (२)
ता वामेषे रथानामुर्वी गव्यूतिमेषाम्.
रातहव्यस्य सुष्टुतिं दधृक्स्तोमैर्मनामहे.. (३)
हे रातहव्य ऋषि की स्तुतियां सुनने वाले मित्र व वरुण! हम इसलिए तुम्हारी स्तुति
करते हैं कि तुम दूर तक फैले मार्ग में चलने वाले हमारे रथों की रक्षा के लिए चलते हो. (३)
अधा हि काव्या युवं दक्षस्य पूर्भिरद्भुता.
नि केतुना जनानां चिकेथे पूतदक्षसा.. (४)
हे स्तुतियोग्य, शुद्ध बलसंपन्न एवं मुझ चतुर यजमान की स्तुति से चकित मित्र व वरुण!
तुम अनुकूल मन से यजमानों की स्तुति सुनते हो. (४)
तदृ॒तं पृथिवि बृहच्छ्रव एष ऋषीणाम्.
ज्यसानावरं पृथ्वति क्षरन्ति यामभिः.. (५)
हे धरती! हम ऋषियों की अन्न की अभिलाषा पूरी करने के लिए तुम्हारे ऊपर बहुत सा
जल है. गतिशील मित्र व वरुण गमनों द्वारा बहुत सा जल बरसाते हैं. (५)
आ यद्वामीयचक्षसा मित्र वयं च सूरयः.
व्यचिष्ठे बहुपाय्ये यतेमहि स्वराज्ये.. (६)
हे दूर तक देखने वाले मित्र व वरुण! हम यजमान एवं स्तोतागण तुम्हारे परम विस्तृत
एवं बहुतों से आकृष्ट करने वाले स्वराज्य में पहुंचें. (६)
सूक्त—६७ देवता—मित्र व वरुण
बळित्था देव निष्कृतमादित्या यजतं बृहत्.
वरुण मित्रार्यमन्वर्षिष्ठं क्षत्रमाशाथे.. (१)
हे अदितिपुत्र मित्र, वरुण एवं अर्यमा देव! तुम वास्तविक रूप में वर्तमान, यज्ञ के लिए
हितकारक, विस्तृत एवं विशाल बल धारण करते हो. (१)
आ यद्योनिं हिरण्ययं वरुण मित्र सदथः.
धर्तारा चर्षणीनां यन्तं सुम्नं रिशादसा.. (२)