ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 862, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंईळे अग्निं स्ववसं नमोभिरिह प्रसत्तो वि चयत्कृतं नः.
रथैरिव प्र भरे वाजयद्भिः प्रदक्षिणिन्मरुतां स्तोममृध्याम्.. (१)
मैं श्यावाश्व ऋषि के स्तोत्रों द्वारा उत्तम रक्षा करने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि
यहां आकर मेरे यज्ञकर्म को जानें. लोग जिस प्रकार रथों की सहायता से इच्छित स्थान पर
पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार हम अन्न की अभिलाषा से पूर्ण स्तोत्रों द्वारा अपना अभिमत पूरा
करें. हम प्रदक्षिणा द्वारा मरुतों के समूह को बढ़ावें. (१)
आ ये तस्थुः पृषतीसु श्रुतासु सुखेषु रुद्रा मरुतो रथेषु.
वना चिदुग्रा जिहते नि वो भिया पृथिवी चिद्रेजते पर्वतश्चित्.. (२)
हे रुद्रपुत्र मरुतो! तुम बिंदुकियों वाली प्रसिद्ध घोड़ियों द्वारा खींचे जाते हुए एवं शोभन
द्वारों वाले रथों पर बैठते हो. हे अधिक बलसंपन्न मरुतो! जब तुम रथों पर बैठते हो, तब
तुम्हारे भय से वन, धरती एवं पर्वत कांपने लगते हैं. (२)
पर्वतश्चिन्महि वृद्धो बिभाय दिविश्चोत्सानु रेजत स्वने वः.
यत्क्रीळथ मरुत ऋष्टिमन्त आपइव सध्रयञ्चो धवध्वे.. (३)
हे मरुतो! जब तुम भयंकर शब्द करते हो, उस समय महान् विस्तृत पर्वत भी डर जाते
हैं एवं स्वर्ग के शिखर भी कांपने लगते हैं. हे मरुतो! जब तुम हाथों में आयुध लेकर क्रीड़ा
करते हो, तब जलों के समान तेज दौड़ते हो. (३)
वराइवेद्वैतवासो हिरण्यैरभि स्वधाभिस्तन्वः पिपिश्रे.
श्रिये श्रेयांसस्तवसो रथेषु सत्रा महांसि चक्रिरे तनूषु.. (४)
विवाह के योग्य धनी नवयुवक जिस तरह सोने के गहनों एवं जलों में स्नान द्वारा अपने
शरीर को सुंदर बनाता है, उसी तरह सर्वश्रेष्ठ व शक्तिशाली मरुद्गण रथों पर एकत्रित होकर
अपने शरीरों में महान् शोभा धारण करते हैं. (४)
अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय.
युवा पिता स्वपा रुद्र एषां सुदुघा पृश्निः सुदिना मरुद्भ्यः.. (५)
समान शक्ति वाले मरुद्गण आपस में छोटे या बड़े नहीं हैं. वे सौभाग्य के लिए भ्रातृप्रेम
के साथ बड़े हुए हैं. मरुतों के पिता रुद्र नित्य युवा एवं शोभन कर्मों वाले हैं. इनकी माता पृश्नि
गाय के समान दुहने योग्य हैं. ये दोनों मरुतों को कल्याणकारी हों. (५)
यदुत्तमे मरुतो मध्यमे वा यद्वावमे सुभगासो दिवि ष.
अतो नो रुद्रा उत वा न्व१ स्याग्ने वित्ताद्द्विषो यद्यजाम.. (६)
हे मरुतो! तुम उत्तम, मध्यम एवं अधम स्वर्ग में रहते हो. हे रुद्रपुत्रो! इन तीनों स्थानों से
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