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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 768, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 768

नू रोदसी बृहद्भिर्नो वरूथैः पत्नीवद्भिरिषयन्ती सजोषाः.
उरूची विश्वे यजते नि पातं धिया स्याम रथ्यः सदासाः.. (४)
हे हमें अन्न देने को इच्छुक एवं परस्पर मिले हुए धरती-आकाश! तुम दोनों विस्तृत,
फैले हुए एवं यज्ञ के योग्य होकर हमें पत्नी सहित विशाल धन दो तथा हमारी रक्षा करो. हम
अपने यज्ञकर्मों के फल के कारण रथों एवं दासों के स्वामी बनें. (४)
प्र वां महि द्यवी अभ्युपस्तुतिं भरामहे. शुची उप प्रशस्तये.. (५)
हे द्युतिसंपन्न धरती-आकाश! तुम्हें लक्ष्य करके हम महान् स्तुति करेंगे. हम प्रार्थना
करने के लिए तुम शुद्धों के समीप आते हैं. (५)
पुनाने तन्वा मिथः स्वेन दक्षेण राजथः. ऊह्याथे सनादृतम्.. (६)
हे दिव्य-गुण-सहित धरती-आकाश! तुम अपनी मूर्तियों एवं शक्तियों द्वारा एक-दूसरे
को पवित्र करते हुए सुशोभित बनो एवं सदा यज्ञ को वहन करो. (६)
मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्. परि यज्ञं नि षेदथुः.. (७)
हे महान् धरती-आकाश! तुम अपने मित्र स्तोता की अभिलाषा पूरी करो. तुम अन्न का
विभाग एवं यज्ञ को पूर्ण करके चारों ओर बैठो. (७)
सूक्त—५७ देवता—क्षेत्रपति आदि
क्षेत्रस्य पतिना वयं हितेनेव जयामसि.
गामश्वं पोषयित्न्वा स नो मृळातीदृशे.. (१)
हम बंधु तुल्य क्षेत्रपति की सहायता से क्षेत्र को विजय करेंगे. वे हमारी गायों एवं घोड़ों
को पुष्टि प्रदान करते हुए हमें इसी प्रकार सुखी करें. (१)
क्षेत्रस्य पते मधुमन्तमूर्मिं धेनुरिव पयो अस्मासु धुक्ष्व.
मधुश्चुतं घृतमिव सुपूतमृतस्य नः पतयो मृळयन्तु.. (२)
हे क्षेत्रपति! गाएं जिस प्रकार दूध देती हैं, उसी प्रकार तुम मधु टपकाने वाला, घी के
समान पवित्र एवं मधुर जल हमें दो. यज्ञ के स्वामी हमें सुखी करें. (२)
मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम्.
क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो अस्त्वरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम.. (३)
ओषधियां, द्युलोक, जल-समूह, आकाश एवं क्षेत्रपति हमारे लिए मधुयुक्त हों. हम
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