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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 687, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 687

पापासः सन्तो अनृता असत्या इदं पदमजनता गभीरम्.. (५)
बंधु-बांधवरहित नारी के समान यज्ञादि त्यागकर जाने वाले, पति से द्वेष करने वाली
स्त्रियों के समान दुराचारी, पापी, मानस तथा वाचिक-सत्य-रहित लोग नरक को प्राप्त होते
हैं. (५)
इदं मे अग्ने कियते पावकामिनते गुरुं भारं न मन्म.
बृहद्दधाथ धृषता गभीरं यह्वं पृष्टं प्रयसा सप्तधातु.. (६)
हे पवित्रकर्त्ता अग्नि! जैसे अल्प-शक्ति वाले व्यक्ति पर भारी बोझा लादा जाता है, उसी
प्रकार तुम्हारा कर्म मेरे लिए भारी है, पर मैं उसका त्याग नहीं करता. तुम मुझे प्रिय, अधिक,
शत्रुओं को हराने वाले अन्न से युक्त, गंभीर, महान्, स्पर्श करने योग्य एवं सात प्रकार का धन
दान करो. (६)
तमिन्न्वे३व समना समानमभि क्रत्वा पुनती धीतिरश्याः.
ससस्य चर्मन्नधि चारु पृश्नेरग्रे रुप आरुपितं जबारु.. (७)
उपयुक्त एवं हमें पवित्र करने वाली स्तुति कर्म के साथ शीघ्र ही वैश्वानर के पास पहुंचे.
वह स्तुति वैश्वानर अग्नि के दीप्तिमंडल पृथ्वी से निश्चित स्वर्गलोक के ऊपर घूमने के लिए
देवों ने पूर्व दिशा में स्थापित की है. (७)
प्रवाच्यं वचसः किं मे अस्य गुहा हितमुप निणिग्वदन्ति.
यदुस्रियाणामप वारिव व्रन्पाति प्रियं रुपो अग्रं पदं वेः.. (८)
मेरे इस वचन के अतिरिक्त कहने योग्य अन्य बात क्या है? जानने वाले लोग कहते हैं
कि दूध काढ़ने वाले जिस दूध को जल के समान निकालते हैं, उसे वैश्वानर अग्नि गुफा में
छिपाकर रखते हैं एवं फैली हुई धरती के सर्वप्रिय तथा श्रेष्ठ स्थान की रक्षा करते हैं. (८)
इदमु त्यन्महि महामनीकं यदुस्रिया सचत पूर्व्यं गौः.
ऋतस्य पदे अधि दीद्यानं गुहा रघुष्यद्रघुयद्विवेद.. (९)
दुधारू गायों द्वारा अग्निहोत्रादि के लिए सेवित, अत्यंत चमकता हुआ, गुफा में शीघ्र
गतिशील, प्रसिद्ध, महान् एवं पूज्य सूर्यमंडल रूपी वैश्वानर अग्नि को मैं जान चुका हूं. (९)
अध द्युतानः पित्रोः सचासामनुत गुह्यं चारु पृश्नेः.
मातुष्पदे परमे अन्ति षद्गोर्वृष्णः शोचिषः प्रयतस्य जिह्वा.. (१०)
दीप्यमान वैश्वानर अग्नि धरती-आकाशरूपी माता-पिता के बीच में व्याप्त रहकर गाय
के थन में छिपे हुए दूध को मुंह से पीने के लिए जागृत हुए थे. कामवर्षी, दीप्त एवं
आहवनीय रूप से निश्चित वैश्वानर अग्नि की जीभ गोमाता के थन रूप उत्तम स्थान में
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