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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 642

हे युद्ध करने वाले, कामवर्षी, धनाधिपति, समर्थ, नित्य-तरुण, शत्रुपराभवकारी,
जरारहित, वज्रधारी, तीनों लोकों में प्रसिद्ध एवं महान् इंद्र! तुम्हारे वीरकर्म महान् हैं. (१)
महाँ असि महिष वृष्ण्येभिर्धनस्पृदुग्र सहमानो अन्यान्.
एको विश्वस्य भुवनस्य राजा स योधया क्षयया च जनान्.. (२)
हे पूज्य एवं उग्र इंद्र! तुम महान्, अपने धन को पार ले जाने वाले, शक्ति द्वारा शत्रुओं
को हराने वाले एवं समस्त संसार के अकेले राजा हो. तुम शत्रुओं का नाश करो एवं अपने
भक्तों को अपने स्थान पर दृढ़ करो. (२)
प्र मात्राभी रिरिचे रोचमानः प्र देवेभिर्विश्वतो अप्रतीतः.
प्र मज्मना दिव इन्द्रः पृथिव्याः प्रोरुर्महो अन्तरिक्षादृजीषी.. (३)
तेजस्वी, सभी के द्वारा अज्ञेय एवं सोम के स्वामी इंद्र पर्वतों से महान् बल में देवों से
विशिष्ट, धरती, आकाश एवं विशाल अंतरिक्ष से भी विस्तृत हैं. (३)
उरुं गभीरं जनुषाभ्यु१ग्रं विश्वव्यचसमवतं मतीनाम्.
इन्द्रं सोमासः प्रदिवि सुतासः समुद्रं न स्रवत आ विशन्ति.. (४)
हे महान्, गंभीर, स्वभाव से ही उग्र, सभी जगह व्याप्त व स्तुतिकर्त्ताओं के रक्षक इंद्र!
एक दिन पहले निचोड़ा गया सोम तुम्हारे पास उसी प्रकार जाता है, जिस प्रकार सरिताएं
सागर में समा जाती हैं. (४)
यं सोममिन्द्र पृथिवीद्यावा गर्भं न माता बिभृतस्त्वाया.
तं ते हिन्वन्ति तमु ते मृजन्त्यध्वर्यवो वृषभ पातवा उ.. (५)
हे इंद्र! धरती और आकाश तुम्हारी कामना से गर्भ धारण करने वाली माता के समान
सोम को धारण करते हैं. हे कामवर्षी इंद्र! अध्वर्युगण उसी सोम को तुम्हारे लिए प्रेषित करते
हैं एवं तुम्हारे पीने के लिए उसे शुद्ध करते हैं. (५)
सूक्त—४७ देवता—इंद्र
मरुत्वाँ इन्द्र वृषभो रणाय पिबा सोममनुष्वधं मदाय.
आ सिञ्चस्व जठरे मध्व ऊर्मिं त्वं राजासि प्रदिवः सुतानाम्.. (१)
हे जलवर्षक एवं मरुतों के स्वामी इंद्र! तुम पुरोडाशादि के साथ सोमरस को संग्राम एवं
प्रसन्नता के लिए पिओ. तुम मद करने वाले सोम को अधिक मात्रा में अपने पेट में भरो. तुम
एक दिन पहले निचोड़े गए सोम के स्वामी हो. (१)
सजोषा इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान्.