ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 631, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्ध में धनलाभ एवं वृत्र असुर का नाश करने के निमित्त हम बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र
को बुलाते हैं. (५)
वाजेषु सासहिर्भव त्वामीमहे शतक्रतो. इन्द्र वृत्राय हन्तवे.. (६)
हे शतक्रतु इंद्र! तुम युद्ध में शत्रुओं को हराओ. हम वृत्र का नाश करने के लिए तुम्हें
बुलाते हैं. (६)
द्युम्नेषु पृतनाज्ये पृत्सुतूर्षु श्रवःसु च. इन्द्र साक्ष्वाभिमातिषु.. (७)
हे इंद्र! धन, युद्ध, वीरों एवं बल का अभिमान करने वाले हमारे शत्रुओं को हराओ. (७)
शुष्मिन्तमं न ऊतये द्युम्निनं पाहि जागृविम्. इन्द्र सोमं शतक्रतो.. (८)
हे शतक्रतु इंद्र! हमारी रक्षा के लिए अतिशय शक्तिशाली, यशस्वी एवं जागरणशील
सोमरस को पिओ. (८)
इन्द्रियाणि शतक्रतो या ते जनेषु पञ्चसु. इन्द्र तानि त आ वृणे.. (९)
हे शतक्रतु इंद्र! गंधर्व, पितर, देव, असुर एवं राक्षस इन पांच जनों में जो इंद्रियां हैं, उन्हें
हम तुम्हारी ही समझते हैं. (९)
अग्रन्निन्द्र श्रवो बृहद्द्युम्नं दधिष्व दुष्टरम्. उत्ते शुष्मं तिरामसि.. (१०)
हे इंद्र! सोमरूप बहुत सा अन्न तुम्हें प्राप्त हो. हमें शत्रुओं द्वारा दुस्तर अन्न दो. हम
तुम्हारा उत्तम बल बढ़ाते हैं. (१०)
अर्वावतो न आ गह्यथो शक्र परावतः. उ लोको यस्ते अद्रिव इन्द्रेह तत आगहि..
(११)
हे शक्तिशाली इंद्र! समीप अथवा दूर के स्थान से हमारे सामने आओ. हे वज्रधारी इंद्र!
तुम्हारा जो भी उत्तम लोक है, वहां से तुम इस यज्ञ में आओ. (११)
सूक्त—३८ देवता—इंद्र
अभि तष्टेव दीधया मनीषामत्यो न वाजी सुधुरो जिहानः.
अभि प्रियाणि मर्मृशत्पराणि कवींरिच्छामि सन्दृशे सुमेधाः.. (१)
हे स्तोता! बढ़ई जिस प्रकार लकड़ी का सुधार करता है, उसी प्रकार तुम इंद्र की स्तुति
को सभी प्रकार दीप्त करो. सुंदर जुए में जुते हुए एवं वेगशाली घोड़े के समान यज्ञकर्म में
संलग्न होकर एवं इंद्र के अतिशय प्रियकर्मों का स्मरण करता हुआ उत्तम बुद्धि वाला मैं उन
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