ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 624, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरो, क्योंकि तुम दूर से आए हो. जिस प्रकार बालक को स्तन पिलाने के लिए माता झुकती
है अथवा पुरुष का आलिंगन करने के लिए युवती झुकती है, उसी प्रकार हम भी तुम्हारे लिए
नीची हुई जाती हैं.” (१०)
यदङ्ग त्वा भरताः सन्तरेयुर्गव्यन्ग्राम इषित इन्द्रजूतः.
अर्शाह प्रसवः सर्गतक्त आ वो वृणे सुमतिं यज्ञियानाम्.. (११)
विश्वामित्र ने कहा—"हे नदियो! तुम्हारे द्वारा आज्ञा पाए हुए, इंद्र द्वारा प्रेरित पार जाने
के इच्छुक एवं पार जाने की चेष्टा करने वाले भरतवंशी लोग तुम्हें पार करेंगे. तुम यज्ञ की
पात्र हो. मैं सभी जगह तुम्हारी स्तुति करूंगा.” (११)
अतारिषुभरता गव्यवः समभक्त विप्रः सुमतिं नदीनाम्.
प्र पिन्वध्वमिषयन्तीः सुराधा आ वक्षणाः पृणध्वं यात शीभम्.. (१२)
“गायों की अभिलाषा करने वाले भरतवंशी लोग पार पहुंच गए. मेधावी मैं तुम्हारी
स्तुति करता हूं. अन्न उत्पन्न करती हुई एवं शोभन धन से युक्त तुम दोनों अन्य नदियों को पूर्ण
करो एवं जल्दी बहो.” (१२)
उद्व ऊर्मिः शम्या हन्त्वापो योक्त्राणि मुञ्चत.
मादुष्कृतौ व्येनसाघ्न्यौ शूनमारताम्.. (१३)
"हे नदियो! तुम्हारी लहरें जुए की रस्सी से नीची बहें. तुम्हारा जल रस्सियों को न छुए.
पापरहित, कल्याण कर्म करने वाली एवं तिरस्कारहीन नदियां इस समय बढ़ें नहीं.” (१३)
सूक्त—३४ देवता—इंद्र
इन्द्रः पूर्भिदातिरद्दाससर्कैर्विद्वद्वसुर्दयमानो वि शत्रून्.
ब्रह्मजूतस्तन्वा वावृधानो भूरिदात्र आपृणद्रोदसी उभे.. (१)
पुरभेदनकारी, महिमा प्रकट करने वाले, धनों से युक्त एवं असुरों की विशेष रूप से
हिंसा करने वाले इंद्र ने दिवस को अपने तेजों द्वारा बढ़ाया. स्तुति सुनकर आकर्षित होने
वाले, अपने शरीर के द्वारा बढ़ते हुए एवं विविध आयुधों को धारण करने वाले इंद्र ने धरती
और आकाश को सब ओर से तृप्त किया है. (१)
मखस्य ते तविषस्य प्र जूतिमियर्मि वाचममृताय भूषन्.
इन्द्र क्षितीनामसि मानुषीणां विशां दैवीनामुत पूर्णयावा.. (२)
हे इंद्र! तुझ स्तुतियोग्य एवं शक्तिशाली को अलंकृत करता हुआ मैं अन्न प्राप्ति के लिए
मन से स्तुति करता हूं. हे इंद्र! तुम मानवी एवं दैवी प्रजाओं के आगे चलने वाले हो. (२)