सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 597, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 597

और कल्याण के कारण बनो. (३)
अग्निं सुदीतिं सुदृशं गृणन्तो नमस्यामस्त्वेज्यं जातवेदः.
त्वां दूतमरतिं हव्यवाहं देवा अकृण्वन्नमृतस्य नाभिम्.. (४)
हे जातवेद अग्नि! हम शोभन दीप्ति वाले, सुंदर एवं स्तुति के योग्य तुम्हें नमस्कार करते
हैं. देवों ने तुम्हें विषयों से आसक्ति रहित, हव्य वहन करने वाला दूत तथा अमृत की नाभि
बनाया है. (४)
यस्त्वद्धोता पूर्वो अग्ने यजीयान्द्विता च सत्ता स्वधया च शम्भुः.
तस्यानु धर्म प्र यजा चिकित्वोऽथा नो धा अध्वरं देववीतौ.. (५)
हे सर्वज्ञ अग्नि! तुमसे पहले जो विशेष यज्ञ करने वाले हुए थे एवं स्वधा के साथ उत्तम
तथा मध्यम स्थानों पर बैठे कर जिन्होंने सुख पाया था, उनके धारक गुणों का विचार करके
पहले उनका यज्ञ पूरा करो. इसके बाद देवों को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ पूरा करो. (५)
सूक्त—१८ देवता—अग्नि
भवा नो अग्ने सुमना उपेतौ सखेव सख्ये पितरेव साधुः.
पुरुद्रुहो हि क्षितयो जनानां प्रति प्रतीचीर्दहतादरातीः.. (१)
हे अग्नि! तुम हमारे सामने आकर अनुकूल एवं कर्मसाधक बनो, जिस प्रकार मित्र के
प्रति मित्र एवं संतान के प्रति माता-पिता होते हैं. मनुष्य मनुष्यों के द्रोही बने हैं. तुम हमारे
विरोधी शत्रुओं को भस्म करो. (१)
तपो ष्वग्ने अन्तराँ अमित्रान् तपा शंसमरुषः परस्य.
तपो वसो चिकितानो अचित्तान्वि ते तिष्ठन्तामजरा अयासः.. (२)
हे अग्नि! हमें हराने के इच्छुक शत्रुओं के बाधक बनो. हमारे शत्रु तुम्हें द्रव्य नहीं देते,
उनकी इच्छा नष्ट करो. हे निवास देने वाले एवं कर्मज्ञाता अग्नि! यज्ञकर्म में मन न लगाने
वालों को दुःखी करो, क्योंकि तुम्हारी किरणें जरारहित एवं निर्बाध हैं. (२)
इध्मेनाग्न इच्छमानो घृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय.
यावदीशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसेयाय देवीम्.. (३)
हे अग्नि! मैं धन की अभिलाषा करता हुआ तुम्हें वेग और सामर्थ्य देने के लिए समिधा
एवं घी के साथ हव्य देता हूं. मैं जब तक स्तुतियों से तुम्हारी वंदना कर सकूं, तब तक मुझे
धन दो एवं मेरी इस स्तुति को अपरिमित धन के हेतु अद्वितीय बनाओ. (३)
उच्छोचिषा सहसस्पुत्र स्तुतो बृहद्वयः शशमानेषु धेहि.
ebook converter DEMO Watermarks*