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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 571

हे उत्तम नेता अग्नि! तुम्हारे समीप जाते हुए हम पशु आदि धनों के कारण रूप यज्ञों
को करते हुए तुम्हें हव्य देते हैं एवं शोभन बल से युक्त अन्न देकर देवविरोधी शत्रुओं को
पराजित करते हैं. (१६)
आ देवानामभवः केतुरग्ने मन्द्रो विश्वानि काव्यानि विद्वान्.
प्रति मर्ताँ अवासयो दमूना अनु देवान्रथिरो यासि साधन्.. (१७)
हे रथी अग्नि! तुम यज्ञ में देवों के प्रशंसनीय केतु, सभी स्तोत्रों के जानने वाले, सभी
मनुष्यों को उनके घरों में बसाने वाले एवं देवों का कार्य सिद्ध करके उनके पीछे चलने वाले
हो. (१७)
नि दुरोणे अमृतो मर्त्यानां राजा ससाद विदथानि साधन्.
घृतप्रतीक उर्विया व्यद्यौदग्निर्विश्वानि काव्यानि विद्वान्.. (१८)
दीप्तिमान् एवं नित्य अग्नि यज्ञों को पूर्ण करते हुए होताओं के घर में स्थित होते हैं. घृत
के कारण बढ़ने वाले अग्नि सभी बातों को जानते एवं प्रकाशित होते हैं. (१८)
आ नो गहि सख्येभिः शिवेभिर्महान्महीभिरूतिभिः सरण्यन्.
अस्मे रयिं बहुलं सन्तरुत्रं सुवाचं भागं यशसं कृधी नः.. (१९)
हे सब जगह जाने के इच्छुक महान् अग्नि! कल्याणकारी सख्य एवं रक्षा के विशाल
साधन लेकर हमारे पास आओ एवं विस्तीर्ण, उपद्रवों से रहित, शोभन वचन युक्त, सुभग
तथा यशस्वी बनाओ. (१९)
एता ते अग्ने जनिमा सनानि प्र पूर्व्याय नूतनानि वोचम्.
महान्ति वृष्णे सवना कृतेमा जन्मञ्जन्मन् निहितो जातवेदाः.. (२०)
हे पुरातन अग्नि! हम तुम्हें लक्ष्य करके सनातन एवं नवीन स्तुतियों को पढ़ते हैं. सब
प्राणियों को जानने वाले एवं मनुष्यों के बीच स्थित कामवर्षक अग्नि को लक्ष्य करके हमने ये
यज्ञ किए हैं. (२०)
जन्मञ्जन्मन् निहितो जातवेदा विश्वामित्रेभिरिध्यते अजस्रः.
तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.. (२१)
सभी मनुष्यों के बीच स्थित तथा सभी प्राणियों को जानने वाले अग्नि को विश्वामित्र के
गोत्र वाले ऋषि सदैव प्रज्वलित रखते हैं. हम उन यज्ञ योग्य अग्नि की कृपा प्राप्त करके
उत्तम कल्याण पाएंगे. (२१)
इमं यज्ञं सहसावन् त्वं नो देवत्रा धेहि सुक्रतो रराणः.
प्र यंसि होतर्बृहतीरिषो नोऽग्ने महि द्रविणमा यजस्व.. (२२)
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