ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत स्या वां रुशतो वप्ससो गीस्त्रिबर्हिषि सदसि पिन्वते नॄन्.
वृषां वां मेघो वृषणा पीपाय गोर्न सेके मनुषो दशस्यन्.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुम तेजस्वी हो. तुम्हारी स्तुति तीन कुशों से युक्त यज्ञगृह में यजमान
को प्रसन्न करे. हे कामवर्षको! तुमसे संबंधित बादल वर्षा करता हुआ मनुष्यों को धन देकर
प्रसन्न करे. (८)
युवां पूषेवाश्विना पुरन्धिरग्निर्मुषां न जरते हविष्मान्.
हुवे यद्वां वरिवस्या गृणानो विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! पूषा के समान बुद्धिमान् एवं हव्य धारण करने वाला तुम्हारा यजमान
अग्नि और उषा के समान तुम्हारी स्तुति करता है. सेवापरायण स्तोता के साथ-साथ यजमान
भी तुम्हारी स्तुति करता है, जिससे हम अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (९)
सूक्त—१८२ देवता—अश्विनीकुमार
अभूदिदं वयुनमो षु भूषता रथो वृषण्वान्मदता मनीषिणः.
धियञ्जिन्वा धिष्ण्या विश्पलावसू दिवो नपाता सुकृते शुचिव्रता.. (१)
हे मेधावी ऋत्विजो! मेरे मन में यह ज्ञान उत्पन्न हुआ है कि अश्विनीकुमारों का कामवर्षी
रथ आ गया है. उनके सामने जाकर उन्हें स्तुति से प्रसन्न करो. वे मुझ पुण्यवान् को कर्मबुद्धि
देने वाले, स्तुतियोग्य, विश्पला का कल्याण करने वाले, आदित्य के नाती एवं पवित्रकर्म करने
वाले हैं. (१)
इन्द्रतमा हि धिष्ण्या मरुत्तमा दस्रा दंसिष्ठा रथ्या रथीतमा.
पूर्णं रथं वहेथे मध्व आचितं तेन दाश्वांसमुप याथो अश्विना.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम निश्चय ही उत्तम स्वामी, स्तुति के योग्य, मरुतों में श्रेष्ठ,
शत्रुनाशक, कर्म करने में अतिशय कुशल, रथ के स्वामी एवं रक्षा करने वालों में श्रेष्ठ हो. तुम
मधु से भरे हुए रथ को सभी जगह ले जाते हो. तुम उसी रथ पर बैठकर यज्ञ में आओ. (२)
किमत्र दस्रा कृणुथः किमासाथे जनो यः कश्चिदहविर्महीयते.
अति क्रमिष्टं जुरतं पणेरसुं ज्योतिर्विप्राय कृणुतं वचस्यवे.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम यहां क्या कर रहे हो? तुम इस मनुष्य के समीप क्यों ठहरे हो?
यदि व्यक्ति यज्ञरहित होकर भी लोगों में आदर पा रहा हो तो उसे हराओ. उस पणि के प्राणों
का नाश करो. मैं मेधावी तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. मुझे प्रकाश दो. (३)
जम्भयतमभितो रायतः शुनो हतं मृधो विदथुस्तान्यश्विना.