ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 464, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रसन्न करे और तुम वर्षा करके स्तुतिकर्त्ता भक्तों की इच्छा पूरी करो. (८)
असाम यथा सुखखाय एन स्वभिष्टयो नरां न शंसै:.
असद्यथा न इन्द्रो वन्दनेष्ठास्तुरो न कर्म नयमान उक्था.. (९)
हे स्वामी इंद्र! ऐसी कृपा करो कि हम तुम्हारे सखा बनकर अपनी स्तुतियों द्वारा उसी
प्रकार अपनी अभिलाषाएं पूर्ण कर सकें, जिस प्रकार राजा की स्तुति से करते हैं. हे इंद्र! हम
जिस समय स्तुति करें, उस समय तुम उपस्थित होकर हमारी स्तुतियों के साथ ही हमारे यज्ञ
को भी शीघ्र स्वीकार करो. (९)
विष्पर्धसो नरां न शंसैरस्माकासदिन्द्रो वज्रहस्त:.
मित्रायुवो न पूर्षतिं सुशिष्ठौ मध्यायुव उप शिक्षन्ति यज्ञै:.. (१०)
मनुष्य जिस प्रकार स्तुति द्वारा विरोधियों को मित्र बना लेते हैं. उसी प्रकार हम भी इंद्र
को सखा बनाएंगे. वज्रधारी इंद्र की शक्ति हमारी बनेगी. जिस प्रकार मित्र बनने के इच्छुक
लोग नगर के योग्य शासक स्वामी की पूजा करते हैं, उसी प्रकार हम श्री और यश प्राप्त करने
की इच्छा वाले अध्वर्यु इंद्र की पूजा करते हैं. (१०)
यज्ञो हि ष्मेन्द्रं कश्चिदृन्धञ्जुहुराणश्चिन्मनसा परियन्.
तीर्थे नाच्छा तातृषाणमोको दीर्घो न सिध्रमा कृणोत्यध्वा.. (११)
यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला यज्ञ द्वारा इंद्र की ओर बढ़ता है एवं कुटिल गति व्यक्ति
सदा मन में दु:खी रहता है, जैसे मार्ग में स्वच्छ जल सामने पाकर प्यासा व्यक्ति प्रसन्न होता है
एवं जल तक देर में पहुंचने वाला टेढ़ा मार्ग प्यासे को दु:खी करता है. (११)
मो षू ण इन्द्रात्र पृत्सु देवैरस्ति हि ष्मा ते शुष्मिन्नवया:.
महश्चिद्यस्य मीळ्हुषो यव्या हविष्मतो मरुतो वन्दते गी:.. (१२)
हे इंद्र! संग्राम उपस्थित होने पर मरुद्गणों के साथ हमें छोड़ मत देना. हे शक्तिशाली!
तुम्हारा यज्ञभाग मरुतों से अलग है. हमारी फलों से मिली हुई स्तुति हवियुक्त एवं दानशील
मरुतों की वंदना करती है. (१२)
एष स्तोम इन्द्र तुभ्यमस्मे एतेन गातुं हरिवो विदो न:.
आ नो ववृत्या: सुविताय देव विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१३)
हे इंद्र! यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. हे अश्वस्वामी इंद्र! इस स्तोत्र रूपी मार्ग से हमारे
यज्ञ को जानो और सहज ही हमारे समीप आओ. हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें.
(१३)
सूक्त—१७४ देवता—इंद्र
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