ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे ऋभुओ! तुम सूर्यमंडल में सोकर सूर्य से पूछते हो—“हे आदित्य! हमारे कर्म की
प्रेरणा कौन देता है?” सूर्य इसका उत्तर देते हैं—“तुम्हें जगाने वाला वायु है. वर्ष व्यतीत होने
पर तुम संसार में प्रकाश फैलाओ।” (१३)
दिवा यान्ति मरुतो भूम्यामग्निरयं वातो अन्तरिक्षेण याति.
अद्भिर्याति वरुणः समुद्रैर्युष्माँ इच्छन्तः शवसो नपातः.. (१४)
हे बल के नाती ऋभुओ! तुम्हें देखने की अभिलाषा से मरुत् स्वर्ग से, अग्नि धरती से,
वायु आकाश से एवं वरुण जल से आ रहे हैं. (१४)
सूक्त—१६२ देवता—अश्व
मा नो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऋभुक्षा मरुतः परि ख्यन्.
यद्वाजिनो देवजातस्य सप्तेः प्रवक्ष्यामो विदथे वीर्याणि.. (१)
तुच्छ मनुष्य देवजात एवं शीघ्रगतिशाली अश्व के पराक्रमों का वर्णन कर रहे हैं. ऐसे
विचारक मित्र, वरुण अर्यमा, आयु, इंद्र, ऋभुक्षा एवं वायु हमारी निंदा न करें. (१)
यन्निर्णिजा रेक्णसा प्रावृतस्य रातिं गृभीतां मुखतो नयन्ति.
सुप्राङजो मेम्यद्विश्वरूप इन्द्रापूष्णोः प्रियमप्येति पाथः.. (२)
ऋत्विज् रूपवान एवं सोने के आभूषणों से सजे हुए घोड़े के सामने भेंट करने के उद्देश्य
से बकरे को ले जाते हैं. 'में, में' करता हुआ अनेक रंग का बकरा इंद्र और पूषा का प्रिय है.
वह अश्व के सामने आए. (२)
एष छागः पुरो अश्वेन वाजिना पूष्णो भागो नीयते विश्वदेव्यः.
अभिप्रियं यत्पुरोळाशमर्वता त्वष्टेदैनं सौश्रवसाय जिन्वति.. (३)
समस्त देवों के लिए उपयोगी, पर पूषा का अंश वह बकरा शीघ्र गतिशील अश्व के
सामने लाया जाता है. घोड़े के साथ इस बकरे को प्रयोग करके त्वष्टा देव के लिए स्वादिष्ट
भोजन रूप पुरोडाश बनाया जाए. (३)
यद्धविष्यमृतुशो देवयानं त्रिर्मानुषाः पर्यश्वं नयन्ति.
अत्रा पूष्णः प्रथमो भाग एति यज्ञं देवेभ्यः प्रतिवेदयन्नजः.. (४)
जब ऋत्विज् हवि के योग्य एवं देवों के प्राप्त करने के पात्र अश्व को समय-समय पर
तीन बार अग्नि के चारों ओर घुमाते हैं, तब पूषा का भागरूप पहला बकरा अपनी 'में, में' से
देवयज्ञ का प्रचार करता हुआ जाता है. (४)
होताध्वर्युरावया अग्निमिन्धो ग्रावग्राभ उत शंस्ता सुविप्रः.
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