ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 420, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंदो अरणियों द्वारा उत्पन्न अग्नि तीनों लोकों को प्रकाशित करते हुए एवं समस्त संसारों
को आलोकित करते हुए स्थित होते हैं. वे देवों को बुलाने वाले एवं यज्ञकर्त्ता बनकर प्रोक्षणी
आदि पात्रों के जल के समीप स्थित होते हैं. (४)
अयं स होता यो द्विजन्मा विश्वा दधे वार्याणि श्रवस्या.
मर्तो यो अस्मै सुतुको ददाश.. (५)
जो अग्नि द्विजन्मा हैं, वे ही यज्ञ निष्पन्नकर्त्ता एवं समस्त उत्तम धनों को हव्य प्राप्ति की
इच्छा से धारण करते हैं. इन अग्नि के लिए जो व्यक्ति हवि देता है, वह उत्तम पुत्र वाला बनता
है. (५)
सूक्त—१५० देवता—अग्नि
पुरु त्वा दाश्वान्वोचेऽरिरग्ने तव स्विदा. तोदस्येव शरण आ महस्य.. (१)
हे अग्नि! मैंने तुम्हें तुम्हारा प्रिय हव्य दिया है. इसलिए मैं भांति-भांति की प्रार्थनाएं कर
रहा हूं. मैं तुम्हारा ही सेवक हूं. जिस प्रकार महान् स्वामी के घर में सेवक रहता है, उसी
प्रकार तुम्हारे यज्ञस्थल में मैं निवास करता हूं. (१)
व्यनिनस्य धनिनः प्रहोषे चिदरुषः. कदा चन प्रजिगतो अदेवयोः.. (२)
हे अग्नि देव! जो धनी लोग तुम्हें स्वामी नहीं मानते, जो उत्तम यज्ञ के लिए दक्षिणा नहीं
देते एवं जो देवों की स्तुति नहीं करते, उन देवविरोधी लोगों को धन मत देना. (२)
स चन्द्रो विप्र मर्त्यो महो व्राधन्तमो दिवि. प्रप्रेत्ते अग्ने वनुषः स्याम.. (३)
हे अग्नि! जो बुद्धिमान् मनुष्य तुम्हारा यज्ञ करता है, वह आकाश में चंद्रमा के समान
सबका आह्लादक बनता है एवं प्रधानों का भी प्रधान होता है. इसलिए हम विशेष रूप से
तुम्हारे सेवक हैं. (३)
सूक्त—१५१ देवता—मित्र व वरुण
मित्रं न यं शिम्या गोषु गव्यवः स्वाध्यो विदथे अप्सु जीजनन्.
अरेजेतां रोदसी पाजसा गिरा प्रति प्रियं यजतं जनुषामवः.. (१)
गायों के स्वामी होने के इच्छुक एवं शोभन ध्यान वाले यजमानों ने गायों की प्राप्ति के
निमित्त एवं अपने मनुष्यों की रक्षा के लिए मित्र के सेमान जिस अग्नि को जल के भीतर
यज्ञकर्म से उत्पन्न किया, धरती और आकाश जिस अग्नि के बल और शब्द से कांपते हैं, उसी
प्रिय एवं यज्ञसाधन अग्नि की वे रक्षा करते हैं. (१)
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