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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 413

भात्वक्षसो अत्यक्तुर्न सिन्धवोऽग्ने रेजन्ते अससन्तो अजराः.. (३)
शोभनमुख अग्नि की जरारहित दीप्ति एवं सुदृश्य तथा सब दिशाओं में प्रकाशमान
चिनगारियां शक्तिशालिनी हैं. अग्नि की गतिशील एवं कांपती हुईं लपटें रात्रि का अंधकार नष्ट
करती हैं. (३)
यमेरिरे भृगवो विश्ववेदसं नाभा पृथिव्या भुवनस्य मज्मना.
अग्निं तं गीर्भिर्हिनुहि स्व आ दमे य एको वस्यो वरुणो न राजति.. (४)
भृगुवंशी यजमानों ने समस्त प्राणियों की बलप्राप्ति के उद्देश्य से जिन सर्वधन संपन्न
अग्नि को स्थापित किया है, उन अग्नि को अपने घर में ले जाकर स्तुति करो. वे अग्नि मुख्य
हैं एवं वरुण के समान समस्त धनों के स्वामी हैं. (४)
न यो वराय मरुतामिव स्वनः सेनेव सृष्टा दिव्या यथाशनिः.
अग्निर्जम्भैस्तिगितैरत्ति भर्वति योधो न शत्रून्तस वना न्यृञ्जते.. (५)
जो अग्नि वायु के शब्द, प्रबल आक्रमणकारी की सेना एवं दिव्य वज्र के समान
निवारण नहीं किए जा सकते, वे अपने तीखे दांतों से शत्रुओं की उसी प्रकार हिंसा करें, जिस
प्रकार वनों को जलाते हैं. (५)
कुविन्नो अग्निरुचथस्य वीरसद्वसुष्कुविद्वसुभिः काममावरत्.
चोदः कुवित्तुतुज्यात्सातये धियः शुचिप्रतीकं तमया धिया गृणे.. (६)
ये अग्नि हमारे स्तोत्र की बार-बार कामना करें. सबको निवास प्रदान करने वाले अग्नि
धनों से हमारी कामना पूरी करें. अग्नि यज्ञ की प्रेरणा देने वाले बनकर हमें यज्ञकर्म के लाभ
के लिए बार-बार प्रेरित करें. मैं शोभन ज्वाला वाले अग्नि के प्रति स्तुति का उच्चारण करता
हूं. (६)
घृतप्रतीकं व ऋतस्य धूर्षदमग्निं मित्रं न समिधान ऋञ्जते.
इन्धानो अक्रो विदथेषु दीद्यच्छुक्रवर्णामुदु नो यंसते धियम्.. (७)
यज्ञ का निर्वाह करने वाले एवं दीप्त ज्वालाओं वाले अग्नि को मित्र के समान जलाते
हुए सुशोभित किया जाता है. भली-भांति प्रदीप्ति अग्नि यज्ञों में प्रज्वलित होते हुए हमारी
यात्रादि विषयक निर्मल बुद्धि को जगाते हैं. (७)
अप्रयुच्छन्नप्रयुच्छद्भििरग्ने शिवेभिर्नः पायुभिः पाहि शग्मैः.
अदब्धेभिरदृपितेभिरिष्टेऽनिमिषद्भिः परि पाहि नो जाः.. (८)
हे अग्नि! बिना प्रमाद के निरंतर मंगलकारी एवं सुखद रक्षणों से हमारा कल्याण करो.
हे इष्ट! तुम निमेषरहित एवं अहिंसक उपायों से हमारी एवं हमारी संतान की रक्षा करो. (८)
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