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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 388

नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार चोर का भी अधःपतन होता है. (६)
वनेम तद्धोत्रया चितन्त्या वनेम रयिं रयिवः सुवीर्यं रण्वं सन्तं सुवीर्यम्.
दुर्मन्मानं सुमन्तुभिरेमिषा पृचीमहि.
आ सत्याभिरिन्द्र द्युम्नहूतिभिर्यजत्रं द्युम्नहूतिभिः.. (७)
हे इंद्र! स्तोत्रों द्वारा तुम्हारे गुणों का वर्णन करते हुए हम तुम्हारे समीप आते हैं. हे धन
के स्वामी! हम शोभन सामर्थ्ययुक्त, रमणीय, सदा वर्तमान एवं पुत्रभृत्यादि से युक्त धन को
प्राप्त करें. हे अमित महिमाशली इंद्र! हमारे पास उत्तम स्तोत्र एवं अन्न हों. हम यज्ञ की
अभिलाषा के समान फल देने वाली तथा यशोवर्द्धक स्तुतियों द्वारा यज्ञनिष्पादक इंद्र को
प्राप्त करें. (७)
प्रप्रा वो अस्मे स्वयशोभिरूती परिवर्ग इन्द्रो दुर्मतीनां दरीमन्दुर्मतीनाम्.
स्वयं सा रिषयध्यै या न उपेषे अत्रैः.
हतेमसन्न वक्षति क्षिप्ता जूर्णिर्न वक्षति.. (८)
हे ऋत्विजो! इंद्र अपने यशस्कर रक्षण द्वारा तुम्हारे और हमारे निमित्त दुर्बुद्धि विरोधियों
के विनाशकारी संग्राम में समर्थ हों एवं उन्हें विदीर्ण करें. हमारे भक्षक शत्रुओं ने जो वेगवती
सेना भेजी थी, वह स्वयं ही नाश को प्राप्त हो गई. वह न तो हमारे पास आई और न लौटकर
हमारे विरोधियों के पास पहुंची. (८)
त्वं न इन्द्र राया परीणसा याहि पथाँ अनेहसा पुरो याह्यरक्षसा.
सचस्व नः पराक आ सचस्वास्तमीक आ.
पाहि नो दूरादारादभिष्टिभिः सदा पाह्यभिष्टिभिः.. (९)
हे इंद्र! तुम राक्षसहीन एवं पापरहित मार्ग द्वारा हमें देने के लिए धन लेकर हमारे समीप
आओ. तुम दूरवर्ती एवं निकटवर्ती स्थान से आकर हमसे मिलो, दूर एवं समीप से यज्ञ निर्वाह
के लिए हमारी रक्षा करो तथा हमें पालो. (९)
त्वं न इन्द्र राया तरूषसोग्रं चित्त्वा महिमा सक्षदवसे महे मित्रं नावसे.
ओजिष्ठ त्रातरविता रथं कं चिदमर्त्य.
अन्यमस्मद्रिरिषेः कं चिदद्रिवो रिरिक्षन्तं चिदद्रिवः.. (१०)
हे इंद्र! हमारी आपत्तियों को समाप्त करने वाले धन से हमारा उद्धार करो. जिस प्रकार
सर्वहितकारी मित्र की महिमा है, उसी प्रकार उग्र बल संपन्न इंद्र हमारी रक्षा के लिए
महिमायुक्त हैं. हे शक्तिशाली, रक्षक, पालक, मरणरहित एवं शत्रुनाशक इंद्र! तुम चाहे जिस
रथ पर सवार होकर आओ एवं हमारे अतिरिक्त सबको बाधा पहुंचाओ. हे शत्रुनाशक!
निंदितकर्म वाले शत्रु के बाधक बनो. (१०)
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