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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

विप्रुतं रेभमुदनि प्रवृक्तमुन्निन्धथुः सोममिव स्रुवेण.. (२४)
असुर शत्रुओं ने रेभ ऋषि को पीटा और दुःखद रस्सियों से बांधकर कुएं में डाल दिया.
व्यथित एवं जल से भीगे रेभ दस रात और नौ दिन तक वहीं पड़े रहे. जिस प्रकार अध्वर्यु
सुच की सहायता से सोमरस निकालता है, उसी प्रकार तुमने उन्हें कुएं से निकाला. (२४)
प्र वां दंसांस्यश्विनाववोचमस्य पतिः स्यां सुगवः सुवीरः.
उत पश्यन्नश्रुवन्दीर्घमायुरस्तमिवेज्जरिमाणं जगम्याम्.. (२५)
हे अश्विनीकुमारो! मैंने तुम्हारे पुराकृत कर्मों का वर्णन किया है. मैं सुंदर गायों एवं वीरों
का स्वामी होने के साथ-साथ राष्ट्र का स्वामी बनूं. जिस प्रकार घर का मालिक घर में बिना
बाधा के घुसता है, उसी प्रकार मैं भी आंखों से देखता हुआ दीर्घ आयु भोग कर बुढ़ापे में
प्रवेश करूं. (२५)
सूक्त—११७ देवता—अश्विनीकुमार
मध्वः सोमस्याश्विना मदाय प्रत्नो होता विवासते वाम्.
बर्हिष्मती रातिर्विश्रिता गीरिषा यातं नासत्योप वाजैः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा पुराना होता तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मधुर सोमरस से
तुम्हारी सेवा करता है. ऋत्विजों द्वारा स्तुति के साथ ही कुशों पर हव्य रखा गया है. हमारे
लिए देवबल और अन्न के साथ हमारे यहां आओ. (१)
यो वामश्विना मनसो जवीयान्रथः स्वश्वो विश आजिगाति.
येन गच्छथः सुकृतो दुरोणं तेन नरा वर्तिरस्मभ्यं यातम्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! मन से भी अधिक तीव्रगामी एवं सुंदर घोड़ों वाला तुम्हारा जो रथ
प्रजाओं की ओर जाता है तथा जिससे तुम सुंदर यज्ञ करने वाले लोगों के घर जाते हो, हे
नेताओ! तुम उसी रथ द्वारा हमारे समीप आओ. (२)
ऋर्षिं नरावंहसः पाञ्चजन्यमृबीसादत्रिं मुञ्चथो गणेन.
मिनन्ता दस्योरशिवस्य माया अनुपूर्वं वृष्णा चोदयन्ता.. (३)
हे नेता एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने पांच जनों द्वारा पूजित अत्रि को शतद्वार
यंत्रगृह की पाप रूप तुषानल से पुत्र-पौत्रों सहित छुड़ाया था. इसके लिए तुमने शत्रुओं की
हिंसा एवं दस्युओं की दुःखदायिनी माया का क्रमशः विनाश किया. (३)
अश्वं न गूळ्हमश्विना दुरैवैर्ऋर्षिं नरा वृषणा रेभमप्सु.
सं तं रिणीथो विप्रुतं दंसोभिर्न वां जूर्यन्ति पूर्व्या कृतानि.. (४)
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