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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 347

याभिर्मनं शूरमिषा समावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों से मननीय स्तोत्र द्वारा प्रसन्न होकर अंगिराओं की
रक्षा की थी, पणियों द्वारा गुफा में छिपाई गई गायों के स्थान पर सबसे पहले पहुंचे थे एवं
अन्न देकर वीर्यवान मनु की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों सहित आओ. (१८)
याभिः पत्नीर्विमदाय न्यूहथुरा घ वा याभिररुणीरशिक्षतम्.
याभिः सुदास ऊहथुः सुदेव्यं१ ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१९)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा विमद ऋषि के लिए पत्नी एवं लाल रंग की
गाएं दीं एवं सुदास को प्रसिद्ध धन दिया, उन्हीं उपायों सहित आओ. (१९)
याभिः शंताती भवथो ददाशुषे भुज्युं याभिरवथो याभिरधिगुम्.
ओम्यावतीं सुभरामृतस्तुभं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२०)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों जिन उपायों द्वारा हविदाता यजमान के लिए सुखकर्त्ता
बनते हो, भुज्यु एवं अधिगु की रक्षा की तथा ऋतुस्तुभ ऋषि को सुखकर और भरण योग्य
अन्न प्रदान किया था, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (२०)
याभिः कृशानुमसने दुवस्यथो जवे याभिर्युनो अर्वन्तमावतम्.
मधु प्रियं भरथो यत्सरङ्ग्भ्यस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों ने जिन उपायों से युद्ध में कृशानु की रक्षा की, युवा
पुरुकुत्स के दौड़ते हुए घोड़े को बचाया तथा मधुमक्खियों को सर्वप्रिय मधु प्रदान किया,
उन्हीं उपायों के साथ आओ. (२१)
याभिर्नरं गोषुयुधं नृषाह्ये क्षेत्रस्य साता तनयस्य जिन्वथः.
याभी रथाँ अवथो याभिर्वतस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम जिन उपायों द्वारा गौ प्राप्ति के निमित्त युद्ध करने वाले मनुष्यों
की संग्राम में रक्षा करते हो, क्षेत्र एवं धन प्राप्ति में यजमान के सहायक होते हो एवं उसके
रथों तथा घोड़ों की रक्षा करते हो, उन्हीं के साथ आओ. (२२)
याभिः कुत्समार्जुनेयं शतक्रतू प्र तुर्वीतिं प्र च दभीतिमावतम्.
याभिर्ध्वसन्तिं पुरुषन्तिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२३)
हे शतक्रतु अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों से अर्जुन के पुत्र कुत्स, तुर्वीति एवं
दधीति की रक्षा की थी तथा ध्वसंति और पुरुषंति नामक ऋषियों को सुरक्षित किया, उन्हीं
उपायों के साथ यहां आओ. (२३)
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