सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 345

उपायों द्वारा की तथा जिन उपायों से कर्कन्धु एवं वय्य को बचाया था, उन्हीं उपायों से यहां
आओ. (६)
याभिः शुचन्तिं धनसां सुषंसदं तप्तं घर्मोम्यावन्तमत्रये.
याभिः पृश्निगुं पूरुकुत्समावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा शुचंति को धनसंपन्न एवं शोभनगृह का
स्वामी बनाया, अत्रि को जलाने वाली तप्त अग्नि को सुखदायक बनाया एवं पृश्निगु तथा
पुरुकुत्स की रक्षा की, उन्हीं उपायों से यहां आओ. (७)
याभिः शचीभिर्वृषणा परावृजं प्रान्धं श्रोणं चक्षस एतवे कृथः.
याभिर्वर्तिकां ग्रसितामुञ्चतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (८)
हे कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने जिन कर्मों द्वारा पंगु परावृज को चलने में समर्थ,
अंधे ऋजाश्व को देखने में कुशल, जानुरहित श्रोण को गतिशील एवं वृक द्वारा गृहीत पक्षिणी
वर्तिका को मुक्त किया था, उन्हीं उपायों से आओ. (८)
याभिः सिन्धु मधुमन्तमसश्चतं वसिष्ठं याभिरजरावजिन्वतम्.
याभिः कुत्सं श्रुतर्यं नर्यमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (९)
हे जरारहित अश्विनीकुमारो! जिन उपायों से सिंधु नदी को मधुर प्रवाह वाली, वशिष्ठ
को प्रसन्न एवं कुत्स, श्रुतर्य तथा नर्य ऋषियों को सुरक्षित किया था, उन्ही उपायों सहित हमारे
पास आओ. (९)
याभिर्विश्पलां धनसामथर्व्यं सहस्रमीळह आजावजिन्वतम्.
याभिर्वशमश्व्यं प्रेणिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! जिन उपायों से तुमने धन की स्वामिनी एवं चलने में असमर्थ
विप्रश्चला को हजारों संपत्तियों से पूर्ण एवं संग्राम में जाने योग्य बनाया तथा अश्व ऋषि के
स्तुतिकर्त्ता पुत्र वश ऋषि की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों से यहां आओ. (१०)
याभिः सुदानू औशिजाय वणिजे दीर्घश्रवसे मधु कोशो अक्षरत्.
कक्षीवन्तं स्तोतारं याभिरावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (११)
हे सुंदर दान वाले अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों से उशिजा के पुत्र एवं वाणिज्य
कर्म करने वाले दीर्घश्रवा के निमित्त मेघ से जल बरसाया एवं स्तुतिकर्त्ता कक्षीवान् की रक्षा
की, उन्हीं उपायों को लेकर यहां आओ. (११)
याभि रसां क्षोदसोदनः पिपिन्वथुरनश्वं याभी रथमावतं जिषे.
याभिस्त्रिशोक उस्रिया उदाजत ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्... (१२)
ebook converter DEMO Watermarks*