ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 333, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुख के निमित्त पुत्र से रहित कभी न हों. हे धरती और आकाश! मेरी इस बात को समझो.
(३)
यज्ञं पृच्छाम्यवमं स तद्द्दूतो वि वोचति.
क्व ऋतं पूर्व्यं गतं कस्तद्बिभर्ति नूतनो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (४)
मैं देवों में आदिभूत एवं यज्ञ के योग्य अग्नि से निवेदन करता हूं कि वे मेरी बात देवों के
दूत के रूप में उन्हें बता दें. हे अग्नि! तुम पूर्वकाल में स्तोताओं का जो कल्याण करते थे, वह
कहां गए? उस गुण को अब कौन धारण करता है? हे धरती और आकाश! मेरी यह बात
जानो. (४)
अमी ये देवा: स्थन त्रिष्वा रोचने दिव:.
कद्व ऋतं कदनृतं क्व प्रत्ना व आहुतिर्वित्तं मे अस्य रोदसी.. (५)
हे देवो! सूर्य द्वारा प्रकाशित तीनों लोकों में तुम वर्तमान रहो. तुम्हारा सत्य, असत्य एवं
प्राचीन आहुति कहां है? हे धरती और आकाश! मेरी यह बात जानो. (५)
कद्व ऋतस्य धर्णसि कद्वरुणस्य चक्षणम्.
कदर्यम्णो महस्पथाति क्रामेम दूढ्यो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (६)
हे देवो! तुम्हारा सत्यधारण कहां है? वरुण की कृपादृष्टि कहां है? महान् अर्यमा का वह
मार्ग कहां है, जिस पर चलकर हम पापबुद्धि शत्रुओं से दूर जा सकें? हे धरती और आकाश!
हमारी इस बात को जानो. (६)
अहं सो अस्मि य: पुरा सुते वदामि कानि चित्.
तं मा व्यन्त्याध्यो३ वृको न तृष्णजं मृगं वित्तं मे अस्य रोदसी.. (७)
हे देवो! मैं वही हूं, जिसने प्राचीनकाल में तुम्हारे निमित्त सोम निचोड़े जाने पर कुछ
स्तोत्र बोले थे. जिस प्रकार प्यासे हिरन को व्याघ्र खा जाते हैं, उसी प्रकार मानसिक कष्ट मुझे
खा रहे हैं. हे धरती और आकाश! मेरे इस कष्ट को जानो. (७)
सं मा तपन्त्यभित: सपत्नीरिव पर्शव:.
मूषो न शिश्ना व्यदन्ति माध्य: स्तोतारं ते शतक्रतो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (८)
हे इंद्र! कुएं की आसपास की दीवारें मुझे उसी प्रकार दु:खी कर रही हैं, जिस प्रकार दो
सौतें बीच में स्थित अपने पति को कष्ट देती हैं. हे शतक्रतु! जिस तरह चूहा सूत को काटता
है, उसी प्रकार दु:ख मुझे खा रहे हैं. हे धरती और आकाश! मेरी यह बात जानो. (८)
अमी ये सप्त रश्मयस्तत्रा मे नाभिरातता.
त्रितस्तद्द्वेदाप्त्य: स जामित्व्याय रेभति वित्तं मे अस्य रोदसी.. (९)
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