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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 315

हे देवो! सोम निचोड़ने वाले यजमान का रथ अन्य यजमानों के रथ से आगे हो. हमारा
पाप हमारे शत्रुओं को बाधा पहुंचावे. तुम हमारी स्तुति पर ध्यान दो और उसके अनुकूल
चलकर हमें पुष्ट करो. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर हमारी कोई हिंसा न कर
सके. (८)
वधैर्दुःशंसाँ अप दूढ्यो जहि दूरे वा ये अन्ति वा के चिदत्रिण.
अथा यज्ञाय गृणते सुगं कृध्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (९)
हे अग्नि! तुम हननसाधन आयुधों से अपवाद के पात्र एवं दुर्बुद्धि लोगों का वध करो.
जो शत्रु हमारे समीप या दूर हैं, उनका नाश करो. इस प्रकार तुम अपनी स्तुति करने वाले
यजमान का मार्ग शोभन बनाओ. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न
हों. (९)
यदयुक्तथा अरुषा रोहिता रथे वातजूता वृषभस्येव ते रवः.
आदिन्वसि वनिनो धूमकेतुनाग्ने सख्ये मा रिषाम वयं तव.. (१०)
हे अग्नि! तुम तेजस्वी, लाल रंग वाले एवं वायु वेग वाले दोनों घोड़ों को रथ में जोतते
समय बैल के समान शब्द करते हो एवं अपने झंडे रूपी धूम से वन को घेर लेते हो. तुम्हारी
मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१०)
अध स्वनादुत बिभ्युः पतत्रिणो द्रप्सा यत्ते यवसादो व्यस्थिरन्.
सुगं तत्ते तावकेभ्यो रथेभ्योऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (११)
हे अग्नि! वन प्रदेश को जलाने वाला तुम्हारा शब्द सुनकर पक्षी डर जाते हैं. जब
तुम्हारी ज्वालाएं वन में वर्तमान तिनकों को भक्षण करके सभी ओर फैलती हैं, तब तुम्हारे
लिए एवं तुम्हारे रथ के लिए समस्त अरण्य सुगम बन जाता है. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके
हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (११)
अयं मित्रस्य वरुणस्य धायसे ऽवयातां मरुतां हेळो अद्भुत:.
मृळा सु नो भूत्वेषां मनः पुनरग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१२)
अग्नि के स्तोता को मित्र और वरुण धारण करें. अंतरिक्ष में वर्तमान मरुतों का क्रोध
महान् होता है. हे अग्नि! हमारी रक्षा करो. इन मरुतों का मन हमारे प्रति प्रसन्न हो. हे अग्नि!
तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१२)
देवो देवानामासि मित्रो अद्भुतो वसुर्वसूनामसि चारुरध्वरे.
शर्मन्त्स्याम तव सप्रथस्तमेऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१३)
हे तेजस्वी अग्नि! तुम सब देवों के परम मित्र, सुंदर एवं यज्ञों की समस्त संपत्तियों के
निवास हो. हम तुम्हारे अति विस्तृत यज्ञगृह में वर्तमान हों. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम
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