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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः. सं देवत्रा बभूवथुः.. (९)
हे अग्नि और सोम! तुम समान धन वाले एवं एक साथ आह्वान करने योग्य हो. तुम
हमारी स्तुति सुनो. तुम सभी देवों से अधिक प्रसिद्ध हो. (९)
अग्नीषोमावनेन वां यो वां घृतेन दाशति. तस्मै दीदयतं बृहत्.. (१०)
हे अग्नि एवं सोम! जो यजमान तुम्हें घृत से युक्त हवि प्रदान करता है, उसे पर्याप्त धन
दो. (१०)
अग्नीषोमाविमानि नो युवं हव्या जुजोषतम्. आ यातमुप नः सचा.. (११)
हे अग्नि और सोम! हमारा यह हव्य स्वीकार करो एवं इस कार्य के लिए एक साथ
आओ. (११)
अग्नीषोमा पिपृतमर्वतो न आ प्यायन्तामुस्रिया हव्यसूदः.
अस्मे बलानि मघवत्सु धत्तं कृणुतं नो अध्वरं श्रुष्टिमन्तम्.. (१२)
हे अग्नि और सोम! हमारे अश्वों का पालन करो. क्षीर आदि हव्य को उत्पन्न करने वाली
हमारी गाएं बढ़ें. तुम धनयुक्त हम लोगों को बल दो एवं हमारे यज्ञ को धनसंपन्न करो. (१२)
सूक्त—९४ देवता—अग्नि
इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया.
भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१)
जिस प्रकार बढ़ई रथ का निर्माण करता है, उसी प्रकार हम पूज्य एवं सब प्राणियों को
जानने वाले अग्नि के प्रति बुद्धि निर्मित यह स्तुति समर्पित करते हैं. इस अग्नि की सेवा से
हमारी बुद्धि कल्याणी बनती है. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर हम हिंसा को
प्राप्त न हों. (१)
यस्मै त्वमायजसे स साधत्यन्वर्वा क्षेति दधते सुवीर्यम्.
स तूताव नैनमश्नोत्यंहतिरग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (२)
हे अग्नि! तुम जिस यजमान के निमित्त यज्ञ करते हो, वह अभीष्ट प्राप्त कर लेता है,
शत्रुओं की पीड़ा से रहित होकर निवास करता है, उत्तम शक्ति धारण करता है एवं वृद्धि पाता
है. उसे कभी दरिद्रता नहीं मिलती. हम तुम्हारी मित्रता को पाकर किसी के द्वारा सताए न
जावें. (२)
शकेम त्वा समिधं साधया धियस्त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्.
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