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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

हे अग्नि! यजमान उपद्रवरहित गांवों में बने अपने यज्ञगृहों में निरंतर काष्ठ जलाकर
सामने बैठे तुम्हारी सेवा करते हैं एवं अनेक प्रकार का हव्य अन्न देते हैं. तुम सब अन्न के
स्वामी बनकर हमें देने के लिए धन धारण करो. (४)
वि पृक्षो अग्ने मघवानो अश्युर्वि सूरयो ददतो विश्वमायुः.
सनेमं वाजं समिथेष्वर्यो भागं देवेषु श्रवसे दधानाः.. (५)
हे अग्नि! हविरूप धन से युक्त यजमान अन्न प्राप्त करें एवं तुम्हारी स्तुति करने वाले
तथा हवि देने वाले विद्वान् संपूर्ण जीवन प्राप्त करें. हम संग्राम में शत्रु के अन्न पर अधिकार
करने के पश्चात् यश के लिए देवों को हवि का भाग दें. (५)
ऋतस्य हि धेनवो वावशानाः स्मदूध्नीः पीपयन्त द्युभक्ताः.
परावतः सुमतिं भिक्षमाणा वि सिन्धवः समया सस्रुरद्रिम्.. (६)
अग्नि की बार-बार अभिलाषा करती हुईं नित्य दुग्धशालिनी एवं तेजस्विनी गाएं यज्ञ
देश में प्राप्त अग्नि को दूध पिलाती हैं. बहती हुई सरिताएं अग्नि से अनुग्रह की याचना करती
हुईं पर्वत के समीप से दूर देश को बहती हैं. (६)
त्वे अग्ने सुमतिं भिक्षमाणा दिवि श्रवो दधिरे यज्ञियासः.
नक्ता च चक्रुरुषसा विरूपे कृष्णं च वर्णमरुणं च सं धुः.. (७)
हे द्योतमान अग्नि! यज्ञ के स्वामी देवों ने तुम्हारे अनुग्रह की याचना करते हुए तुम में
हवि स्थापित किया. इसके पश्चात् इस अनुष्ठान के निमित्त उषा और रात्रि को भिन्न-भिन्न
रूपवाला बनाया अर्थात् निशा को काला और उषा को अरुण बनाया. (७)
यान्नाये मर्त़ान्त्सुषूदो अग्ने ते स्याम मघवानो वयं च.
छायेव विश्वं भुवनं सिसक्ष्यापप्रिवान्रोदसी अन्तरिक्षम्.. (८)
हे अग्नि! तुम जिन लोगों को धन प्राप्त करने के लिए यज्ञकर्म के प्रति प्रेरित करते हो,
वे और हम यज्ञ प्राप्त करें. तुमने आकाश, धरती और अंतरिक्ष को अपने तेज से भर दिया है
तथा तुम छाया के समान सारे संसार की रक्षा करते हो. (८)
अर्वद्भिदग्ने अर्वतो नृभिर्नॄन्वीरैर्वीरान्वनुयामा त्वोताः.
ईशानासः पितृवित्तस्य रायो वि सूरयः शतहिमा नो अश्युः.. (९)
हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर हम अपने अश्वों से शत्रु के अश्वों का, अपने भटों
द्वारा शत्रु के भटों का एवं अपने पुत्रों की सहायता से शत्रु के पुत्रों का वध करेंगे. परंपरा से
प्राप्त धन के स्वामी एवं विद्वान् हमारे पुत्र सौ वर्ष जीवित रहकर सुख भोगें. (९)
एता ते अग्न उचथानि वेधो जुष्टानि सन्तु मनसे हृदे च.