ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रेरित करे. (८)
मनो न योऽध्वनः सद्य एत्येकः सत्रा सुरो वस्व ईशे.
राजाना मित्रावरुणा सुपाणी गोषु प्रियममृतं रक्षमाणा.. (९)
आकाश मार्ग में मन के समान शीघ्र जाने वाले एकाकी सूर्य अनेक स्थानों में रखे हुए
धन को प्राप्त करते हैं. प्रकाशमान एवं सुंदर बाहुयुक्त मित्र और वरुण प्रसन्नताकारक तथा
अमृत तुल्य दूध की रक्षा करते हुए हमारी गायों में स्थित रहें. (९)
मा नो अग्ने सख्या पित्र्याणि प्र मर्षिष्ठा अभि विदुष्कविः सन्.
नभो न रूपं जरिमा मिनाति पुरा तस्या अभिशस्तेरधीहि.. (१०)
हे अग्नि! हमारे प्रति तुम्हारी जो परंपरागत मित्रता है, उसे नष्ट मत करो, क्योंकि तुम
भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान सबके ज्ञाता हो. जिस प्रकार आकाश को सूर्य की किरणें ढक
लेती हैं, उसी प्रकार हमारा विनाश करने वाले बुढ़ापे को हमसे दूर रखने का प्रयत्न करो.
(१०)
सूक्त—७२ देवता—अग्नि
नि काव्या वेधसः शश्वतस्कर्हस्ते दधानो नर्या पुरूणि.
अग्निर्भुवद्रयिपती रयीणां सत्रा चक्राणो अमृतानि विश्वा.. (१)
मनुष्यों के लिए हितकारक धन हाथ में धारण करते हुए नित्य एवं ज्ञानसंपन्न अग्नि ब्रह्म
संबंधी मंत्रों को स्वीकार करते हैं. स्तुतिकर्त्ताओं को अमृत प्रदान करते हुए अग्नि उत्कृष्ट धन
के स्वामी होते हैं. (१)
अस्मे वत्सं परि षन्तं न विन्दन्निच्छन्तो विश्वे अमृता अमूराः.
श्रमयुवः पदव्यो धियंधास्तस्थुः पदे परमे चार्वग्नेः.. (२)
मरणरहित समस्त देवगण एवं मोहहीन मरुद्गण चाहने पर भी हमारे प्रिय एवं सब ओर
वर्तमान अग्नि को प्राप्त नहीं कर सके. अग्नि के बिना वे दुःखी हो गए एवं पैदल चलते हुए
थक कर प्रकाश को देखते हुए अग्नि के स्थान में उपस्थित हुए. (२)
तिस्रो यदग्ने शरदस्त्वामिच्छुचिं घृतेन शुचयः सपर्यान्.
नामानि चिद्दधिरे यज्ञियान्यसूदयन्त तन्व१: सुजाताः.. (३)
हे शुद्ध अग्नि! दीप्तिसंपन्न मरुतों ने तीन वर्ष तक घृत से तुम्हारी पूजा की, तब तुम
प्रकट हुए. तभी तुम्हारी अनुकंपा से उन्होंने यज्ञ में प्रयोग करने योग्य नाम एवं शरीर प्राप्त
किए. (३)
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