ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोता निष्त्तो मनोरपत्ये स चिन्न्वासां पती रयीणाम्.
इच्छन्त रेतो मिथस्तनूषु सं जानत स्वैर्दक्षैरमूराः.. (७-८)
हे अग्नि! तुम मनु की प्रजारूप यजमानों के देव आह्वानकारी एवं उनके धन के स्वामी
थे. उन प्रजाओं ने पुत्र उत्पन्न करने की इच्छा से अपने शरीर में वीर्य की अभिलाषा की थी. वे
मोह त्याग कर अपने समर्थ पुत्र के साथ चिरकाल तक जीवित हैं. (७-८)
पितुर्न पुत्राः क्रतुं जुषन्त श्रोष्ण्ये अस्य शासं तुरासः.
वि राय और्णोद्दुरः पुरुक्षुः पिपेष नाकं स्तृभिर्दमूनाः.. (९-१०)
जिस प्रकार पुत्र पिता की आज्ञा का पालन करता है, उसी प्रकार यजमान शीघ्रतापूर्वक
अग्नि की आज्ञा सुनते हैं एवं उनके आदेश के अनुसार कार्य करते हैं. विविध अन्नों के स्वामी
अग्नि धन देते हैं, जो यज्ञ का साधन है. यज्ञगृह के प्रति आसक्ति रखने वाले अग्नि ने आकाश
को नक्षत्रों से सुशोभित किया. (९-१०)
सूक्त—६९ देवता—अग्नि
शुक्रः शुशुक्वाँ उषो न जारः पप्रा समीची दिवो न ज्योतिः.
परि प्रजातः क्रत्वा बभूथ भुवो देवानां पिता पुत्रः सन्.. (१-२)
शुभ्रवर्ण अग्नि उषा के जार सूर्य के समान सभी पदार्थों को प्रकाशित करते हैं एवं
प्रकाशक सूर्य के समान अपने तेज से धरती और आकाश को भर देते हैं. हे अग्नि! तुम
प्रादुर्भूत होकर अपने कर्म से सारे संसार को व्याप्त कर लेते हो. तुम पुत्र के समान देवों के
दूत होते हुए भी पिता के समान उनके पालक हो. (१-२)
वेधा अदृप्तो अग्निॢवजानन्धूर्न गोनां स्वाद्मा पितूनाम्.
जने न शेव आहूर्यः सन्मध्ये निष्त्तो रण्वो दुरोणे.. (३-४)
मेधावी, दर्परहित एवं कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य को जानने वाले अग्नि उसी प्रकार समस्त अन्नों
को स्वादिष्ट बना देते हैं, जिस प्रकार गाय का स्तन बनाता है. अग्नि यज्ञ में बुलाए जाने पर
लोक सुखकारी पुरुष के समान यज्ञस्थल में आकर बैठते हैं. (३-४)
पुत्रो न जातो रण्वो दुरोणे वाजी न प्रीतो विशो वि तारीत्.
विशो यदह्ने नृभि सनीळा अग्निर्दैवत्वा विश्वन्यश्याः.. (५-६)
यज्ञगृह में उत्पन्न होकर अग्नि पुत्र के समान आनंदकारी एवं प्रसन्न होकर संग्राम में अश्व
के समान शत्रुओं को भगाने वाले हैं. जब मैं ऋषियों के साथ मिलकर एकत्र निवास करने
वाले देवों को बुलाता हूं तो यह अग्नि स्वयं ही उन देवताओं का रूप बना लेते हैं. (५-६)
ebook converter DEMO Watermarks*