ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे इंद्र! तुम गुणों की महत्ता में सबसे अधिक हो, क्योंकि तुमने असुरजन्य भय उत्पन्न
होते ही जल ग्रहण किया एवं अपने शत्रुशोषक बल द्वारा धरती और आकाश को धारण
किया. विश्व में व्याप्त समस्त प्राणी, पर्वत तथा अन्य महान् एवं दृढ़ पदार्थ तुम्हारे भय से उसी
प्रकार कांपते हैं, जिस प्रकार आकाश में सूर्य की किरणें कांपती हैं. (१)
आ यद्धरी इन्द्र विव्रता वेरा ते वज्रं जरिता बाह्वोर्धात्.
येनाविहर्यतक्रतो अमित्रान्पुर इष्णासि पुरुहूत पूर्वीः.. (२)
हे इंद्र! जब तुम अपने विविध कर्म वाले घोड़ों को रथ में जोड़ते हो, तभी स्तोता तुम्हारे
हाथ में वज्र देता है. हे अनिच्छित कर्म वाले इंद्र! तुम उसी वज्र से शत्रुओं का विध्वंस करते
हो. हे बहु यजमानों द्वारा आहूत इंद्र! तुम उसी वज्र द्वारा शत्रुओं के अनेक पुरों का भेदन
करते हो. (२)
त्वं सत्य इन्द्र धृष्णुरेतान्त्वमृभुक्षा नर्यस्त्वं षाट्.
त्वं शुष्णं वृजने पृक्ष आणौ यूने कुत्साय द्युमते सचाहन्.. (३)
हे इंद्र! तुम सर्वोत्कृष्ट एवं इन शत्रुओं को हराने वाले हो. तुम ऋभुओं के स्वामी, मानवों
के हितकारक एवं शत्रुओं को हराने वाले हो. वीर संहारक एवं शक्तिप्रधान युद्ध में तुमने
तेजस्वी एवं युवक कुत्स के सहायक बनकर शुष्ण नामक असुर का वध किया. (३)
त्वं ह त्यदिन्द्र चोदीः सखा वृत्रं यद्वृजिन्व्षकर्मन्नुभ्नाः.
यद्वृ शूर वृषमणः पराचैर्वि दस्यूँर्योनावकृतो वृथाषाट्.. (४)
हे वृष्टिकर्त्ता एवं वज्रयुक्त इंद्र! जिस समय तुमने कुत्स के धन को छीनने वाले शत्रु का
वध किया था, हे शत्रुप्रेरक, कामवर्धक एवं सहज ही शत्रुनाशक इंद्र! उस समय तुमने
युद्धक्षेत्र में दस्युओं को दूर भगाकर उनका नाश किया था एवं कुत्स की सहायता करके उसे
यशस्वी बनाया था. (४)
त्वं ह त्यदिन्द्रारिषण्यन्दृळ्हस्य चिन्मर्तानामजुष्टौ.
व्य१स्मदा काष्ठा अर्वते वर्धनेव वज्रिञ्छ्नथिह्यमित्रान्.. (५)
हे इंद्र! यद्यपि तुम किसी दृढ़ व्यक्ति को हानि पहुंचाना नहीं चाहते हो, फिर भी यदि हम
स्तोताओं को शत्रु घेर लेते हैं तो तुम हमारे घोड़ों के चलने के लिए सभी दिशाओं को मुक्त
कर देते हो. हे वज्रधारी इंद्र! कठिन वज्र से हमारे शत्रुओं को मारो. (५)
त्वां ह त्यदिन्द्रार्णसातौ स्वर्मीळ्हे नर आजा हवन्ते.
तव स्वधाव इयमा समर्ये ऊतिर्वाजेष्वतसाय्या भूत.. (६)
जिस युद्ध में प्रवृत्त होने से लोगों को लाभ और धन मिलने की संभावना होती है, उस में
वे सहायता के लिए तुम्हें बुलाते हैं. हे बलशाली! युद्धक्षेत्र में तुम हमारी रक्षा करो. युद्धभूमि
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