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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 230

होतारं विश्ववेदसं सं हि त्वा विश इन्धते.
स आ वह पुरुहूत प्रचेतसोऽग्ने देवाँ इह द्रवत्.. (७)
तुझ होम निष्पादक एवं सर्वज्ञ अग्नि को प्रजाएं भली-भांति प्रज्वलित करती हैं. हे
बहुतों द्वारा आहूत अग्नि! तुम उत्तम ज्ञान संपन्न देवों को इस यज्ञ में शीघ्र लाओ. (७)
सवितारमुषसमश्विना भगमग्निं व्युष्टिषु क्षप:.
कण्वासस्त्वा सुतसोमास इन्धते हव्यवाहं स्वध्वर.. (८)
हे शोभन यज्ञ से युक्त अग्नि! निशा समाप्ति के पश्चात् प्रभात होने पर सविता, उषा,
अश्विनीकुमार, भग आदि को यज्ञ में ले आओ. सोमरस निचोड़ने वाले मेधावी ऋत्विज् तुम्हें
प्रचंड करते हैं. (८)
पतिर्ह्यध्वराणामग्ने दूतो विशामसि.
उषर्बुध आ वह सोमपीतये देवाँ अद्य स्वर्दृश:.. (९)
हे अग्नि! तुम प्रजाओं के यज्ञपालक एवं देवताओं के दूत हो. प्रातःकाल जागकर सूर्य
के दर्शन करने वाले देवों को सोमरस पीने के लिए यहां लाओ. (९)
अग्ने पूर्वा अनूषसो विभावसो दीदेथ विश्वदर्शत:.
असि ग्रामेष्वविता पुरोहितो ऽसि यज्ञेषु मानुष:.. (१०)
हे विशिष्ट प्रकाशवान् एवं धन के स्वामी अग्नि! तुम सबके दर्शनीय हो. तुम अतीतकाल
में उषा के पश्चात् प्रकाशित होते रहे हो. तुम गायों के रक्षक, यज्ञ की वेदी के पूर्व दिशा वाले
भाग में अब भी स्थित एवं यज्ञकर्त्ताओं के हितसाधक हो. (१०)
नि त्वा यज्ञस्य साधनमग्ने होतारमृत्विजम्.
मनुष्वद्देव धीमहि प्रचेतसं जीरं दूतममर्त्यम्.. (११)
हे अग्नि! तुम यज्ञ के साधन, देवताओं का आह्वान करने वाले, ऋत्विज्, उत्तम
ज्ञानसंपन्न, शत्रुओं की आयु नष्ट करने वाले, देवदूत तथा मरणरहित हो. हम मनु के समान
तुम्हें यज्ञ में स्थापित करते हैं. (११)
यद्देवानां मित्रमहः पुरोहितोऽन्तरो यासि दूत्यम्.
सिन्धोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयोऽग्नेर्भ्राजन्ते अर्चयः.. (१२)
हे मित्रपूजक अग्नि! जब तुम यज्ञवेदी के पूर्व भाग में स्थापित होकर देवयज्ञ में वर्तमान
रहते हुए उनका दूतकर्म करते हो, तब तुम्हारी लपटें उसी प्रकार चमकती हैं, जिस प्रकार
गरजते हुए सागर की लहरें चमकती हैं. (१२)