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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 176

एवं शत्रुओं की बाधा से रहित है। (६)
द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो अध्वरे। यज्ञेषु देवमीळते.. (७)
पुरोहित धन की अभिलाषा से भांति-भांति के यज्ञों में धनप्रद अग्नि की स्तुति करते हैं।
वे सोमलता कूटने के पत्थर हाथ में लिए हैं। (७)
द्रविणोदा ददातु नो वसूनि यानि शृण्विरे। देवेषु ता वनामहे.. (८)
द्रविणोदा अग्नि हमें सभी सुनी संपत्तियां प्रदान करें। हम उन्हें देवयज्ञ में लगावें। (८)
द्रविणोदाः पिपीषति जुहोत प्र च तिष्ठत। नेष्ट्रादृतुभिरिष्यत.. (९)
हे ऋत्विजो! धनदाता अग्नि ऋतुओं के साथ त्वष्टा के पात्र से सोमरस पीना चाहते हैं।
तुम यज्ञ करने के पश्चात् अपने स्थान पर चले जाओ। (९)
यत् त्वा तुरीयमृतुभिर्द्रविणोदो यजामहे। अध स्मा नो ददिर्भव.. (१०)
हे धनदाता अग्नि! मैं ऋतुओं के साथ चौथी बार तुम्हारे उद्देश्य से यज्ञ कर रहा हूं। तुम
हमारे लिए धनदाता बनो। (१०)
अश्विना पिबतं मधु दीद्याग्नी शुचिव्रता। ऋतुना यज्ञवाहसा.. (११)
हे पवित्र कर्म करने वाले अश्विनीकुमारो! प्रकाशमान अग्नि के साथ सोमरस का पान
करो। तुम ऋतुओं के साथ यज्ञ पूरा करते हो। (११)
गार्हपत्येन सन्त्य ऋतुना यज्ञनीरसि। देवान् देवयते यज.. (१२)
हे अग्नि! तुम ऋतुओं के साथ-साथ गार्हपत्य यज्ञ को भी रक्षित करते हो। तुम
देवसेवक यजमान के कल्याण के लिए देवों की पूजा करो। (१२)
सूक्त—१६ देवता—इंद्र
आ त्वा वहन्तु हरयो वृषणं सोमपीतये। इन्द्र त्वा सूरचक्षसः.. (१)
हे कामवर्षक इंद्र! सूर्य के समान तेजस्वी तुम्हारे हरि नामक घोड़े सोमपान के लिए तुम्हें
यहां लावें। (१)
इमा धाना घृतस्नुवो हरी इहोप वक्षतः। इन्द्रं सुखतमे रथे.. (२)
हरि नामक घोड़े सुख देने वाले रथ में यहां घी से युक्त धान्य के पास इंद्र को लावें। (२)
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