सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1664, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1664

हैं. ऊर्ध्वमुख, सेना के समान प्रशंसनीय, शत्रुओं का दमन करने वाले, स्थिर एवं सुखवर्धक
अग्नि को अरणि ने उत्पन्न किया. (२०)
अधा गाव उपमातिं कनाया अनु श्रान्तस्य कस्य चित्परेयुः.
श्रुधि त्वं सुद्रविणो नस्त्वं याळाश्वघ्नस्य वावृधे सूनृताभिः.. (२१)
स्तुतियां करते-करते थके हुए मुझ नाभानेदिष्ट की उत्तम स्तुतियां इंद्र के समीप जाती
हैं. हे शोभन-धन वाले अग्नि! हमारी स्तुतियां इंद्र के समीप जाती हैं. हे शोभन-धन वाले
अग्नि! हमारी स्तुतियां सुनो और हमारे इंद्र का यजन करो. तुम अश्वमेध यज्ञ करने वाले मुझ
मनु के पुत्र को स्तुतियों से बढ़ाते हो. (२१)
अध त्वमिन्द्र विद्ध्य१स्मान्महो राये नृपते वज्रबाहुः.
रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीननेहसस्ते हरिवो अभिष्टौ.. (२२)
हे वज्रबाहु एवं नरपालक इंद्र! हमने विशाल धन की अभिलाषा की है, उसे तुम जानो.
तुम हम हव्यधारक एवं स्तुतिप्रेरकों की रक्षा करो. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम
तुम्हारी दृष्टि में पापरहित बनें. (२२)
अध यद्राजाना गविष्टौ सरत्सरण्युः कारवे जरण्युः.
विप्रः प्रेष्ठः स ह्येषां बभूव परा च वक्षदुत पर्षदेनान्.. (२३)
हे दीप्तिशाली मित्र व वरुण! अंगिरागोत्रीय ऋषि यज्ञ कर रहे थे, उस समय यम गाय
पाने की इच्छा से गए. उनकी स्तुति करने का इच्छुक, ब्राह्मण नाभानेदिष्ट उनका अतिशय
प्रिय हुआ उनका यज्ञ पूरा हो और उन्हें पार पहुंचावे. (२३)
अधा न्वस्य जेन्यस्य पुष्टौ वृथा रेभन्त ईमहे तदू नु.
सरण्युरस्य सूनुरश्वो विप्रश्चासि श्रवसश्च सातौ.. (२४)
हम गौएं पाने की इच्छा से जयशील वरुण की शीघ्र स्तुति करते हुए उनके समीप
अनायास याचना करते हैं. शीघ्रगामी अश्व इस वरुण का पुत्र है. हे वरुण! तुम ब्राह्मण के
समान पूज्य एवं अन्न देने वाले हो. (२४)
युवोर्यदि सख्यायास्मे शर्धाय स्तोमं जुजुषे नमस्वान्.
विश्वत्र यस्मिन्ना गिरः समीचीः पूर्वीव गातुर्दाशत्सूनृतायै.. (२५)
हे मित्र व वरुण! अन्न धारण करने वाला अध्वर्यु तुम दोनों की शक्तिशाली मित्रता के
लिए तुम्हारी सेवा करता है. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके अंगिरागोत्रीय ऋषि को सभी स्थानों
के अनुकूल वचन सुनाई देंगे. जिस प्रकार प्राचीन मार्ग चलने के लिए सुखकर होता है, उसी
प्रकार तुम अपनी प्रिय और सत्य स्तुति हमें प्रदान करो. (२५)
ebook converter DEMO Watermarks*