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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1325, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1325

अनेहो न उरुव्रज उरूचि वि प्रसर्तवे. कृधि तोकाय जीवसे.. (१२)
हे विस्तीर्ण गमन वाली एवं महती अदिति! हम पापहीनों को जीवित रखो, जिससे
हमारे पुत्र जीवित रह सकें. (१२)
ये मूर्धानः क्षितीनामदब्धासः स्वयशसः. व्रता रक्षन्ते अद्रुहः.. (१३)
सबसे मूर्धन्य, मनुष्यों की हिंसा न करने वाले, स्वाधीन यश वाले एवं द्रोहरहित आदित्य
हमारे यज्ञकर्मों की रक्षा करते हैं. (१३)
ते न आस्नो वृकाणामादित्यासो मुमोचत. स्तेनं बद्धमिवादिते.. (१४)
हे आदित्यो! मैं हिंसकों के जाल में इस प्रकार फंस गया हूं, जैसे लोग चोर को पकड़ते
हैं. हे अदिति! तुम हमें छुड़ाओ. (१४)
अपो षु ण इयं शरुरदित्या अप दुर्मतिः. अस्मदेत्वजघ्नुषी.. (१५)
हे आदित्यो! यह जाल एवं दुर्बुद्धि हमारी हिंसा न करके हमसे दूर जाए. (१५)
शश्वद्वि वः सुदानव आदित्या उतिभिर्वयम्. पुरा नूनं बुभुज्महे.. (१६)
हे शोभन दान करने वाले आदित्यो! तुम्हारी रक्षाओं के कारण हम पहले के समान इस
समय भी बहुत से सुख भोगेंगे. (१६)
शश्वन्तं हि प्रचेतसः प्रतियन्तं चिदेनसः. देवाः कृणुथ जीवसे.. (१७)
हे उत्तम ज्ञान वाले देवो! हमारी ओर बार-बार आने वाले पापी शत्रुओं को हमारे जीवन
के लिए हमसे अलग करो. (१७)
तत्सु नो नव्यं सन्यस आदित्या यन्मुमोचति. बन्धाद् बद्धमिवादिते.. (१८)
हे अदिति एवं आदित्यो! वह प्रशंसनीय जाल हमें छोड़ने के कारण सेवायोग्य बने जो
तुम्हारी कृपा से हमें छोड़ता है. जैसे बंधन बंधे हुए पुरुष को छोड़ता है, उसी प्रकार यह जाल
हमें छोड़ता है. (१८)
नास्माकमस्ति तत्तर आदित्यासो अतिष्कदे. यूयमस्मभ्यं मृळत.. (१९)
हे आदित्यो! हमारा वेग तुम्हारे समान नहीं है. तुम्हारा वेग हमें जाल से छुड़ा सकता है.
तुम हमें सुखी करो. (१९)
मा नो हेतिर्विवस्वत आदित्याः कृत्रिमा शरुः. पुरा नु जरसो वधीत्.. (२०)
हे आदित्यो! क्रिया द्वारा बनाया हुआ यह हिंसक जाल विवस्वान् के पुत्र यम के जाल