ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1284, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं एवं इन दिशाओं में प्रजा को दान देते हैं. वरुण दीप्तिशाली स्थान द्वारा माया का नाश करते
हैं एवं स्वर्ग पर आरोहण करते हैं. वरुण सब शत्रुओं का नाश करें. (८)
यस्य श्वेता विचक्षणा तिस्रो भूमिरधिक्षितः.
त्रिरुत्तराणि पप्रतुर्वरुणस्य ध्रुवं सदः स सप्तानामिरज्यति नभन्तामन्यके समे.. (९)
अंतरिक्ष में निवास करने वाले जिस वरुण के तीन श्वेत तेज तीन भूमियों को विस्तृत
करते हैं, उस वरुण का स्थान ध्रुव है. वरुण सातों नदियों के स्वामी हैं. वे सभी शत्रुओं को
मारें. (९)
यः श्वेताँ अधिनिर्णिजश्चक्रे कृष्णाँ अनु व्रता.
स धाम पूर्व्यं ममे यः स्कम्भेन वि रोदसी अजो न द्यामधालयन्नभन्तामन्यके समे..
(१०)
जो वरुण अपनी किरणों को दिन में श्वेत एवं रात में काली बना देते हैं, उन्होंने अपने
कर्मों के उद्देश्यों से द्युलोक, अंतरिक्ष एवं धरती को बनाया है. सूर्य जिस प्रकार द्युलोक को
धारण करते हैं, उसी प्रकार वरुण अंतरिक्ष के द्वारा द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं. वरुण
सभी शत्रुओं को मारें. (१०)
सूक्त—४२ देवता—वरुण आदि
अस्तभ्नाद् द्यामसुरो विश्ववेदा अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः.
आसीदद्विश्वा भुवनानि सम्राड् विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि.. (१)
समस्त धन के स्वामी एवं शक्तिशाली वरुण ने द्युलोक को धारण किया, धरती के
परिमाण को नापा एवं सभी भुवनों के सम्राट् बनकर बैठे. वरुण के सभी कार्य इसी प्रकार के
हैं. (१)
एवा वन्दस्व वरुणं बृहन्तं नमस्या धीरममृतस्य गोपाम्.
स नः शर्म त्रिवरूथं वि यंसत्पातं नो द्यावापृथिवी उपस्थे.. (२)
हे स्तोता! इस प्रकार महान् वरुण की वंदना करो. अमृत के रक्षक एवं धीर वरुण को
नमस्कार करो. वरुण हमें तीन मंजिल वाला मकान दें. वरुण की गोद में वर्तमान हम लोगों
की रक्षा द्यावा-पृथिवी करें. (२)
इमां धियं शिक्षमाणस्य देव क्रतुं दक्षं वरुण सं शिशाधि.
ययाति विश्वा दुरिता तरेम सुतर्माणमधि नावं रुहेम.. (३)
हे वरुण देव! मुझ अनुष्ठानकर्त्ता के यज्ञकर्म, प्रज्ञान एवं बल को तेज बनाओ. हम
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