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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1245, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1245

इन्द्र स्था॒तर्हरी॑णां॒ नकि॑ष्टे पू॒र्व्यस्तु॑तिम्। उदा॑नंश॒ श्वसा॒ न भन्द॑ना.. (१७)
हे हरि नामक अश्वों के स्वामी इंद्र! पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा की गई तुम्हारी स्तुति को कोई
शक्ति अथवा धन के कारण नहीं लांघ सकता. (१७)
तं वो॒ वाजा॑नां॒ पति॑म॒हूम॑हि श्रव॒स्यवः॑। अ॒प्रायु॑भिर्य॒ज्ञेभि॑र्वावृ॒धेन्य॑म्.. (१८)
हम अन्न के अभिलाषी बनकर ऐसे यज्ञों द्वारा अन्नपति एवं वर्धनशील इंद्र को बुलाते हैं,
जो प्रमादहीन ऋत्विजों द्वारा किए जाते हैं. (१८)
एतोन्विन्द्रं॑ स्तवाम॒ सखा॑यः॒ स्तोम्यं॒ नर॑म्। कृ॒ष्टीर्यो विश्वा॒ अभ्यस्त्येक॒ इत्.. (१९)
हे मित्र ऋत्विजो! शीघ्र आओ. हम स्तुति योग्य, नेता एवं अकेले ही सब शत्रु सेनाओं
को पराजित करने वाले इंद्र की स्तुति करेंगे. (१९)
अगो॑रुधाय गवि॒षे द्यु॒क्षाय॒ दस्म्यं॒ वचः॑। घृ॒तात्स्वादी॑यो॒ मधु॑नश्च वोचत.. (२०)
हे ऋत्विजो! स्तुतियों का विरोध न करने वाले, स्तुति के अभिलाषी व दीप्तिशाली इंद्र
के लिए घी और शहद से भी अधिक स्वादिष्ट स्तुतिवचन बोलो. (२०)
यस्या॑मि॒तानि॑ वी॒र्या॑३ न राधः॒ पर्येत॑वे। ज्योति॒र्न वि॒श्वमभ्य॑स्ति दक्षि॒णा.. (२१)
जिस इंद्र की वीरता के कर्म असीमित हैं, जिसका धन शत्रु नहीं पा सकते एवं जिसका
धनदान सब स्तोताओं को इस प्रकार व्याप्त करता है, जैसे प्रकाश आकाश में फैलता है.
(२१)
स्तु॒हीन्द्रं॒ व्य॑श्ववद॒नूर्मिं वा॒जिनं॑ य॒मम्। अर्यो गयं॑ मंहमा॒नं वि दा॒शुषे॑.. (२२)
हे विश्वमना ऋषि! उन्हीं शत्रुओं द्वारा अहिंसनीय, शक्तिशाली एवं स्तोताओं द्वारा
नियंत्रित इंद्र की स्तुति व्यश्व ऋषि के समान करो. स्वामी इंद्र हव्यदाता यजमान को पूजनीय
घर देते हैं. (२२)
ए॒वा नू॒नमुप॑ स्तुहि॒ वैय॑श्व द॒शमं॒ नव॑म्। सु॒वि॒द्वांसं॑ चर्कृ॒त्यं॑ चरणी॒नाम्.. (२३)
हे व्यश्वपुत्र विश्वमना ऋषि! मानवों के दसवें प्राण, प्रशंसनीय, उत्तम, विद्वान् व बार-बार
नमस्कार करने योग्य इंद्र की स्तुति करो. (२३)
वेत्था॒ हि निर्ऋ॑तीनां वज्रहस्त परि॒वृज॑म्। अह॑रहः शुन्ध्युः प॑रि॒पदामि॑व.. (२४)
हे वज्रहस्त इंद्र! सूर्य जिस प्रकार प्रतिदिन पक्षियों के उड़ने से परिचित रहते हैं, उसी
प्रकार तुम राक्षसों की गतियां समझते हो. (२४)
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