ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1182, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे इंद्र! तुम जिस हव्यदाता का सोम पीकर संतोष पाते हो, इस बात को वह अपने आप
ही जानता है. तुम्हारे योग्य सोमरस पात्र में रखा है. तुम उसके पास आकर उसे पिओ. (१२)
रथेष्ठायाध्वर्यवः सोममिन्द्राय सोतन.
अधि ब्रध्नस्याद्रयो वि चक्षते सुन्वन्तो दाश्वध्वरम्.. (१३)
हे अध्वर्युगण! रथ पर बैठे इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ो. चमड़े के ऊपर एक पत्थर पर
दूसरा पत्थर रखा है. यजमान यज्ञ पूरा करने वाले सोमरस को निचोड़ता हुआ सुशोभित है.
(१३)
उप ब्रध्नं वावाता वृषणा हरी इन्द्रमपसु वक्षतः.
अर्वाञ्चं त्वा सप्तयोऽध्वरश्रियो वहन्तु सवनेदुप.. (१४)
अभिलाषापूरक एवं अंतरिक्ष में बार-बार चलने वाले हरि नामक घोड़े इंद्र को हमारे यज्ञ
में लावें. यज्ञ की शोभा बढ़ाने वाले एवं गतिशील घोड़े तुम्हें यज्ञों के पास ले जावें. (१४)
प्र पूषणं वृणीमहे युज्याय पुरूवसुम्.
स शक्र शिक्ष पुरुहूत नो धिया तुजे राये विमोचन.. (१५)
हम अधिक पाने के लिए पूषा का वरण करते हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं पाप से
छुटकारा दिलाने वाले इंद्र! तुम और पूषा ऐसी इच्छा करो कि हम अपनी बुद्धि से धन पाने
और शत्रुनाश के लिए योग्य बनें. (१५)
सं नः शिशीहि भुरिजोरिव क्षुरं रास्व रायो विमोचन.
त्वे तन्नः सुवेदमूस्त्रियं वसु यं त्वं हिनोषि मर्त्यम्.. (१६)
हे इंद्र! नाई के हाथ में रहने वाला छुरा जितना तेज होता है, हमारी बुद्धि उतनी ही तेज
करो. हे पाप से छुड़ाने वाले इंद्र! हमें धन दो. तुम्हारी गाएं हमारे लिए सरलता से मिल जावें.
वही धन तुम स्तोता को देते हो. (१६)
वेमि त्वा पूषन्नृञ्जसे वेमि स्तोतव आघृणे.
न तस्य वेम्यरं हि तद्वसो स्तुषे पज्राय साम्ने.. (१७)
हे पूषा! मैं तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूं. हे दीप्तिसंपन्न पूषा! मैं तुम्हारी स्तुति करना
चाहता हूं. मैं किसी अन्य देवता की स्तुति नहीं करना चाहता, क्योंकि वे सुख नहीं देते. हे
निवास देने वाले पूषा! स्तोता एवं साममंत्र जानने वाले पज्र को वह धन दो. (१७)
परा गोवा यवसं कच्चिदाघृणे नित्यं रेक्णो अमर्त्य.
अस्माकं पूषन्नविता शिवो भव मंहिष्ठो वाजसातये.. (१८)