ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1180, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाशक एवं उपभोग करने वाले तथा लाल रंग का घोड़ा प्रदान करने वाले पाकस्थामा की
स्तुति मैं करता हूं. (२४)
सूक्त—४ देवता—इंद्र आदि
यदिन्द्र प्रागपागुदङ् न्यग्वा हूयसे नृभिः.
सिमा पूरू नृषूतो अस्यानवेऽसि प्रशर्ध तुर्वशे.. (१)
हे इंद्र! यद्यपि तुम पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण के देशों में रहने वाले स्तोताओं द्वारा
बुलाए जाते हो, तथापि स्तोताओं द्वारा राजा अनु के पुत्र के पास जाने को प्रेरित होते हो.
स्तोता तुम्हें तुर्वश के पास जाने के लिए भी प्रेरित करते हैं. (१)
यद्वा रुमे रुशमे श्यावके कृप इन्द्र मादयसे सचा.
कण्वासस्त्वा ब्रह्मभिः स्तोमवाहस इन्द्रा यच्छन्त्या गहि.. (२)
हे इंद्र! जैसे तुम रुम, रुशम, श्यावक एवं कृप नामक राजाओं के साथ प्रसन्न होते हो,
फिर भी स्तोत्र स्मरण रखने वाले कण्वगोत्रीय ऋषि तुम्हें स्तोत्र सुनाते हैं. तुम आओ. (२)
यथा गौरो अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम्.
आपित्वे नः प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिब.. (३)
हे इंद्र! जैसे गौर मृग पानी के लिए प्यासा होने पर बिना घास वाले एवं जलपूर्ण स्थान
पर आता है, उसी प्रकार हम कण्वगोत्रीय ऋषियों की मित्रता पाकर तुम शीघ्र आओ और
हमारे साथ सोमरस पिओ. (३)
मन्दन्तु त्वा मघवन्निन्द्रेन्दवो राधोदेयाय सुन्वते.
आमुष्या सोममपिबश्चमू सुतं ज्येष्ठं तद्दधिषे सहः.. (४)
हे धनस्वामी इंद्र! सोमरस तुम्हें इस प्रकार मत्त करे कि तुम उसे निचोड़ने वाले को धन
दो. तुमने यह सोमरस पिया है. तुमने इसी महान् एवं प्रशंसायोग्य सोमरस के लिए अधिक
मात्रा में शक्ति धारण की है. (४)
प्र चक्रे सहसा सहो बभञ्ज मन्युमोजसा.
विश्वे त इन्द्र पृतनायवो यहो नि वृक्षाइव येमिरे.. (५)
इंद्र ने अपनी शक्ति द्वारा शत्रुओं को वश में किया है एवं अपने ओज से दूसरों का क्रोध
समाप्त किया है. हे महान् इंद्र! तुम्हारे सभी शत्रु वृक्ष के समान धराशायी हो गए हैं. (५)
सहसेणेव सचते यवीय्युधा यस्त आनळ्पस्तुतिम्.
पुत्रं प्रावर्गं कृणुते सुवीर्ये दाश्रोति नम उक्तिभिः.. (६)
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