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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1178, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1178

शग्धि यथा रुशमं श्यावकं कृपमिन्द्र प्रावः स्वर्णरम्.. (१२)
हे इंद्र! स्तोत्रों के द्वारा सेवा करने वाले हमारे यजमान को वह धन दो, जिस धन के
द्वारा तुमने राजा पुरु की रक्षा की थी. तुमने जिस प्रकार रुशम, श्यावक एवं कृप की रक्षा की
थी, वैसे ही शोभन हवि वाले यजमान की रक्षा करो. (१२)
कन्नव्यो अतसीनां तुरी गृणीत मर्त्यः.
न ही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गुणन्त आनशुः.. (१३)
वह कौन नया व्यक्ति है जो सदा गतिशील एवं प्रेरणाप्रद स्तुतियों द्वारा इंद्र की स्तुति
करे. इंद्र की स्तुति करने वाले स्तोता इंद्र की महिमा एवं पहचान को नहीं पा सकते. (१३)
कदु स्तुवन्त ऋतयन्त देवत ऋषिः को विप्र ओहते.
कदा हवं मघवन्निन्द्र सुन्वतः कदु स्तुवत आ गमः.. (१४)
हे इंद्र देव! कौन स्तुति करने वाला तुम्हारे लिए यज्ञ पूर्ण करने की अभिलाषा करता है?
कौन बुद्धिमान् ऋषि तुम्हारी स्तुति करने की सामर्थ्य रखता है? हे धनस्वामी इंद्र! तुम
सोमरस निचोड़ने वाले की पुकार पर कब आते हो? तुम स्तोता के बुलाने पर कब आते हो?
(१४)
उदु त्ये मधुमत्तमा गिरः स्तोमास ईरते.
सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव.. (१५)
प्रसिद्ध एवं अतिशय मधुर स्तुतिवचन एवं स्तोत्र शत्रुविजयी, धनस्वामी, विनाशहीन-
रक्षासाधन वाले एवं अन्नाभिलाषी रथ के समान बोले जाते हैं. (१५)
कण्वाइव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद्धीत्मानशुः.
इन्द्रं स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमेधासो अस्वरन्.. (१६)
कण्वगोत्रीय ऋषियों के समान भृगुगोत्रीय ऋषियों ने भी प्रसिद्ध एवं सर्वत्र व्याप्त इंद्र
को पाया है. प्रियमेध नामक लोगों ने इंद्र की महिमा बढ़ाते हुए स्तुतियों द्वारा पूजा की थी.
(१६)
युक्ष्वा हि वृत्रहन्तम हरी इन्द्र परावतः.
अर्वाचीनो मघवन्सोमपीतय उग्र ऋष्वेभिरा गहि.. (१७)
हे वृत्रहनन में परमकुशल इंद्र! तुम अपने दोनों घोड़ों को रथ में जोतो. हे धनस्वामी एवं
शक्तिशाली इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए दर्शनीय मरुतों के साथ दूर के स्थान से हमारे
सामने आओ. (१७)